सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कमजोर दृष्टि (लो विजन) से पीड़ित छात्र को एमबीबीएस कोर्स करने की इजाजत दे दी है। सर्वोच्च अदालत ने याचिकाकर्ता के शारीरिक विकलांगता श्रेणी में नीट-यूजी पास करने को आधार बनाते हुए यह फैसला दिया।
जस्टिस अरुण मिश्रा और इंदिरा बनर्जी की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता अगर अपनी योग्यता से नीट पास करता है तो एमबीबीएस में दाखिले से मना नहीं किया जा सकता। इस परिस्थिति में याचिकाकर्ता दाखिला पाने का हकदार है और उसे मौजूदा सत्र 2018-19 में दाखिला मिलना चाहिए।
पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) की रिपोर्ट में विसंगतियां पाई थीं, जिसमें कहा गया था कि 40 फीसदी या इससे ज्यादा दृष्टिबाधित छात्रों को अंडर ग्रेजुएट मेडिकल कोर्स में दाखिला नहीं दिया जा सकता। इसके बाद कोर्ट ने नेत्र विभाग के तीन विशेषज्ञों की एक टीम गठित कर सुझाव मांगे थे।
पीठ ने कहा कि विशेषज्ञों ने माना है कि याचिकाकर्ता का दृष्टि दोष विकलांगता अधिनियम के मानदंड के तहत है। पीठ ने कहा कि विकलांगता एक्ट 2016 और मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशन स्पष्ट रूप से याचिकाकर्ता की तरह कम दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति के लिए एमबीबीएस कोर्स में आरक्षण प्रदान करता है।
एमसीआई के वकील विकास सिंह ने इसका विरोध करते हुए कहा कि विकलांगता अधिनियम मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए लागू नहीं होता। अधिनियम का प्रावधान एमसीआई के मामले में लागू नहीं है क्योंकि यह उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण प्रदान करता है न कि तकनीकी शिक्षा संस्थानों में। इस पर कोर्ट ने कहा कि यह तर्क गलत है क्योंकि उच्च शिक्षण संस्थान में सभी तकनीकी संस्थान भी शामिल होते हैं।
इससे पहले याचिकाकर्ता आशुतोष पर्सवानी शारीरिक विकलांग वर्ग के तहत नीट एग्जाम-2018 में शामिल हुआ था, जहां उसकी अखिल भारतीय रैंक 4,68,982 रही थी, लेकिन शारीरिक विकलांग वर्ग में उसकी रैंक पूरे देश में 419वीं थीं। छात्र का आरोप है कि 30 मई को वह परीक्षा के नियमों के तहत दिल्ली के वर्द्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज में दिव्यांग प्रमाणपत्र लेने पहुंचा, लेकिन वहां उसका परीक्षण नहीं किया गया।