सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद पोर्टल पर वक्फ बाय यूजर समेत सभी वक्फ संपत्तियों के अनिवार्य पंजीकरण के लिए समय बढ़ाने से इन्कार कर दिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे समय सीमा से पहले संबंधित न्यायाधिकरणों से संपर्क करें। पीठ ने कहा, हमारा ध्यान धारा 3बी के प्रावधान की ओर आकर्षित किया गया है। चूंकि आवेदकों के पास न्यायाधिकरण के समक्ष उपाय उपलब्ध है इसलिए हम सभी आवेदनों का निपटारा करते हुए उन्हें छह महीने की अवधि की अंतिम तिथि तक न्यायाधिकरण का रुख करने की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं।
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सांसद ओवैसी समेत कई लोगों ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के अलावा ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिममीन (एआईएमआईएम) नेता असदुद्दीन ओवैसी और कई अन्य ने सभी वक्फ संपत्तियों के अनिवार्य पंजीकरण के लिए समय बढ़ाने का अनुरोध करते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया है। इससे पहले एक वकील ने कहा था कि वक्फ के अनिवार्य पंजीकरण की छह महीने की अवधि समाप्त होने वाली है। सुप्रीम कोर्ट ने 15 सितंबर को वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों पर रोक लगा दी, जिनमें यह भी शामिल है कि सिर्फ वे लोग ही किसी संपत्ति को वक्फ के रूप में दे सकते हैं जो पिछले पांच साल से इस्लाम का पालन कर रहे हैं।
सरकार ने क्यों शुरू किया है उम्मीद पोर्टल?
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि केंद्र ने दुरुपयोग को देखते हुए वक्फ बाय यूजर प्रावधान को हटा दिया और प्रत्याशित रूप से यह मनमाना नहीं था। वक्फ बाय यूजर से आशय ऐसी संपत्ति से है, जहां किसी संपत्ति को औपचारिक दस्तावेज के बिना भी धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए उसके दीर्घकालिक उपयोग के आधार पर वक्फ के रूप में मान्यता दी जाती है। भले ही मालिक की ओर से वक्फ की औपचारिक, लिखित घोषणा न की गई हो। केंद्र ने सभी वक्फ संपत्तियों की जियो-टैगिंग के बाद डिजिटल सूची बनाने के लिए छह जून को केंद्रीय पोर्टल एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तिकरण, दक्षता और विकास (उम्मीद) अधिनियम शुरू किया था।
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सीआईसी के चयन पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति 10 दिसंबर को बैठक करेगी, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया
केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली चयन समिति की बैठक 10 दिसंबर को होने की संभावना है। बैठक में मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी) और केंद्रीय सूचना आयोग के सूचना आयुक्तों के नामों पर चर्चा और सिफारिश की जाएगी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें केंद्र और राज्यों में खाली पड़े पदों को जल्द भरने की मांग की गई है। सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने बताया कि बैठक की सूचना समिति के सभी सदस्यों को भेज दी गई है। आरटीआई कानून के तहत इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री की ओर से नामित एक केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं। कोर्ट ने राज्यों के मुख्य सचिवों से भी सूचना आयोगों में स्वीकृत पदों, खाली पदों और लंबित मामलों का ब्योरा मांगा है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि केंद्र समेत कई राज्यों में लंबे समय से पद खाली हैं, जिससे मामलों का ढेर लग रहा है। उन्होंने बताया कि केंद्रीय सूचना आयोग में प्रमुख का पद खाली है और 10 में से 8 पद रिक्त हैं। आयोग में करीब 30 हजार मामले लंबित बताए गए हैं।
लॉरेंस बिश्नोई गिरोह से सुरक्षा की मांग वाली याचिका पर विचार से इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के एक व्यक्ति की उस याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया जिसमें लॉरेंस बिश्नोई गिरोह से धमकी मिलने का दावा करते हुए चौबीसों घंटे सुरक्षा मुहैया कराने की मांग की थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा, आपको कौन धमकी दे रहा है? क्या लॉरेंस बिश्नोई उत्तर प्रदेश में भी काम करता है? वकील ने हां में जवाब देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता चौबीसों घंटे सुरक्षा की मांग कर रहा है। पीठ ने कहा कि बिश्नोई गैंग तो राजस्थान और पंजाब में ही सक्रिय है। इस पर वकील ने कहा, वह सब जगह है, भारत ही नहीं बाहर भी। इसके बाद पीठ ने कहा कि सुरक्षा प्रदान करने की एक प्रक्रिया निर्धारित है और इसके लिए जिला-स्तरीय, राज्य-स्तरीय और संभाग-स्तरीय समितियां हैं। वही इससे निपटेंगी। पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह अपनी शिकायत संबंधित हाईकोर्ट में ले जाए। वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया था, जिसके बाद समिति ने उनके आवेदन पर विचार किया और उसे खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि आप अब इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट जाइए। सुप्रीम कोर्ट का रुख देखते हुए वकील ने याचिका वापस ले ली।
अमित शाह के भतीजे बनकर बिजनेसमैन को ठगने वाले आदमी को जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने आज एक ऐसे आदमी को जमानत दे दी, जिस पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का भतीजा बनकर एक बिजनेसमैन से 3.9 करोड़ रुपये की ठगी करने का आरोप लगा था। जस्टिस जे के माहेश्वरी और विजय बिश्नोई की बेंच ने कहा कि आरोपी अजय कुमार नैयर चार साल से ज़्यादा समय से कस्टडी में है और ट्रायल खत्म होने में समय लगेगा। कोर्ट ने कहा, यह जुर्म इंडियन पीनल कोड (IPC), 1860 के सेक्शन 419 और 420 के साथ सेक्शन 120B और 34 के तहत आता है। कानून की इन धाराओं में अधिकतम सजा सिर्फ सात साल है और याचिकाकर्ता चार साल से अधिक समय से हिरासत में है। बेंच ने कहा कि आरोप 2022 में तय किए गए थे। तीन साल बाद भी, पहले गवाह का क्रॉस-एग्जामिनेशन चल रहा है, जबकि मुकदमे में कुल 34 गवाहों को सूचीबद्ध किया गया है। दिल्ली सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने बेल अर्जी का विरोध किया। हालांकि, कोर्ट ने अपील ठुकराते हुए आरोपी बिजनेसमैन को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। इससे पहले विगत एक सितंबर को, दिल्ली हाई कोर्ट ने नैयर के खिलाफ आरोपों के नेचर को देखते हुए जमानत अर्जी खारिज कर दी थी। आरोपी ने कथित तौर पर केंद्र सरकार से 90 करोड़ रुपये का टेंडर दिलाने का वादा किया था।
केंद्र सरकार को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और अन्य से उस याचिका पर जवाब मांगा जिसमें अग्निशमन सेवाओं, सड़क आपात प्रतिक्रिया और आपदा तैयारी से जुड़ी अहम ढांचागत व मानव संसाधन कमी को दूर करने की अपील की गई है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ता ने कहा है कि उनकी बेटी साल 2019 में सूरत में हुई आगजनी में मारी गई थी। याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि 2016 के नेशनल बिल्डिंग कोड का सख्ती से पालन नहीं हो रहा, जिसके कारण देशभर में बार-बार ऐसे हादसे हो रहे हैं। याचिकाकर्ता ने अपील की है कि राष्ट्रीय स्तर पर आपात प्रतिक्रिया और जवाबदेही डैशबोर्ड बनाने का निर्देश दिया जाए। इसके अलावा जिला-स्तरीय अग्नि जोखिम ऑडिट अनिवार्य करने और डेटा सार्वजनिक करने का निर्देश देने की अपील भी की गई है। दोषी अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश के लिए उच्च स्तरीय न्यायिक आयोग गठित करने की अपील भी की गई है। याचिकाकर्ता की अपील है कि त्रासदी से जुड़े मामलों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष राष्ट्रीय पीठ या ट्रिब्यूनल भी गठित किया जाए।