ये अदालत है...मुंबई का आजाद मैदान नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता बनाने में भाई-भतीजावाद और जजों के रिश्तेदारों को वरीयता का दावा करने वाले वकील को फटकार लगाई। शीर्ष अदालत ने कहा, यह अदालत है, मुंबई का आजाद मैदान नहीं जो आप यहां कुछ भी भाषण दे रहे। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने वकील मैथ्यूज जे नेदुम्परा व अन्य की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में 70 वरिष्ठ अधिवक्ता नामित किए जाने के फैसले को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने याचिका में लगाए गए आरोपों पर सवाल उठाते हुए पूछा, आप कितने जजों के नाम बता सकते हैं जिनके बच्चों को वरिष्ठ बनाया गया है? नेदुम्परा ने जवाब में कहा कि उन्होंने अपने दावे के समर्थन में एक चार्ट प्रस्तुत किया है। हालांकि पीठ इस दलील से सहमत नहीं हुई और याचिका से आरोप नहीं हटाने पर कार्रवाई की चेतावनी दी। पीठ ने कहा, हम आपको याचिका में संशोधन की छूट देते हैं।
बार जजों से डरता है...वाले तर्क पर भी जताई आपत्ति
नेदुम्परा ने जब कहा कि बार जजों से डरता है, तो पीठ ने तर्कों की लाइन पर आपत्ति जताई। जस्टिस गवई ने कहा, यह कानून की अदालत है। यह भाषण देने के लिए मुंबई का आजाद मैदान नहीं है। कानूनी तर्क दें, गैलरी के लिए नहीं। आखिरकार कोर्ट ने वकील को याचिका में दी गई दलीलों पर विचार करने के लिए समय दिया। पीठ ने यह भी कहा कि ऐसी याचिका पर हस्ताक्षर करने वाला वकील भी अवमानना का दोषी है। दिल्ली हाईकोर्ट में वकीलों को वरिष्ठ वकील बनाने का निर्णय शुरू से ही विवादों में रहा है। स्थायी समिति के एक सदस्य ने इस दावे के साथ इस्तीफा दे दिया कि अंतिम सूची उनकी सहमति के बिना तैयार की गई थी।