प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहना मौलिक अधिकार का हिस्सा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहने का अधिकार मौलिक अधिकार का हिस्सा है। इस टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने केंद्र के उस कार्यालय ज्ञापन को खारिज कर दिया, जिसमें मानदंडों का उल्लंघन करने वाली परियोजनाओं को पूर्वव्यापी पर्यावरणीय मंजूरी देने की अनुमति दी गई थी।
जस्टिस अभय एस ओका व जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने वनशक्ति संगठन की याचिका पर दिए गए फैसले में कहा, पर्यावरण की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक के समान ही केंद्र सरकार का भी सांविधानिक दायित्व है। अदालत ने कहा कि उसे केंद्र सरकार के उस प्रयास पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए जो कानून के तहत पूरी तरह से प्रतिबंधित है। पीठ ने कहा, चतुराई से, पूर्वव्यापी प्रभाव शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, लेकिन इसका प्रयोग किए बिना भी, प्रभावी रूप से पूर्वव्यापी प्रभाव से पर्यावरण मंजूरी देने का प्रावधान है। 2021 का कार्यालय ज्ञापन इस अदालत के निर्णयों का उल्लंघन करते हुए जारी किया गया है। इसलिए, पीठ ने 2021 के कार्यालय ज्ञापन (ओएम) और संबंधित परिपत्रों को मनमाना, अवैध और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना, 2006 के विपरीत घोषित किया। पीठ ने केंद्र को
किसी भी रूप या तरीके से पूर्वव्यापी मंजूरी देने या ईआईए अधिसूचना के उल्लंघन में किए गए कार्यों को नियमित करने के लिए निर्देश जारी करने से रोक दिया गया।