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SC Updates: डिजिटल अरेस्ट मामलों पर स्वतः संज्ञान, सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते करेगा सुनवाई

Mon, 16 Mar 2026 03:32 PM IST
Nitin Gautam न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट ने की सुनवाई - फोटो : ANI
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देशभर में बढ़ते डिजिटल अरेस्ट के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट एक हफ्ते बाद सुनवाई करेगा। सीजेआई सूर्यकांत की बेंच से अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने कहा कि इस मामले में हमने एक स्टेटस रिपोर्ट फाइल की है, जिसे कोर्ट पढ़ ले, इसके बाद मामले पर आगे की सुनवाई करें। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने देश भर में डिजिटल अरेस्ट के मामलों में जांच का ज़िम्मा सीबीआई को सौंपा था। साथ ही केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी कोर्ट को बताया था कि डिजिटल अरेस्ट के मामलों से निपटने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया है। गृह मंत्रालय के विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा) इस समिति के अध्यक्ष हैं।
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इसके पहले 9 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट मामले में सुनवाई के दौरान कहा था कि ऐसे घोटालों में बैंक अधिकारी भी आरोपियों के साथ मिले हुए पाए गए हैं। खासकर वरिष्ठ नागरिक इसकी चपेट में आ रहे हैं। एक रिटायर्ड दंपति का उदाहरण देते हुए कोर्ट ने बताया कि उनकी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी ठगों ने छीन ली। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने केंद्र सरकार की ओर से स्टेटस रिपोर्ट पेश कर बताया था कि डिजिटल अरेस्ट से निपटने के लिए अब काफी व्यापक एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) तैयार की गई है। कोर्ट ने इसे प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए जरूरी निर्देश जारी करने की बात कही थी।

सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई की एसओपी का जिक्र किया था, जिसमें साइबर फ्रॉड की आशंका होने पर बैंकों द्वारा अस्थायी डेबिट होल्ड लगाने जैसी त्वरित कार्रवाई का प्रावधान है। कोर्ट ने गृह मंत्रालय से कहा था कि 2 जनवरी 2026 की एसओपी को पूरे देश में लागू किया जाए और इंटर-एजेंसी कोऑर्डिनेशन सुनिश्चित किया जाए। साथ ही इन नियमों को दो हफ्तों के अंदर नोटिफाई करने का आदेश दिया था। कोर्ट ने चार हफ्तों के भीतर एमओयू (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) का ड्राफ्ट तैयार करने को कहा था। इसके साथ ही सीबीआई को डिजिटल अरेस्ट के मामलों की पहचान करने और जांच के निर्देश दिए गए थे। आरबीआई को बैंकों को उचित कदम उठाने का आदेश देने को कहा था। इसके साथ ही इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को समय पर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया था।
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सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार रवि नायर की याचिका पर सुनवाई से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पत्रकार रवि नायर की उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया जिसमें उन्होंने गुजरात पुलिस द्वारा भेजे गए नोटिस को चुनौती दी थी। यह नोटिस अदानी पोर्ट्स एंड एसईजेड लिमिटेड की शिकायत के आधार पर जारी किया गया था, जिसमें एक कथित मानहानिकारक लेख और सोशल मीडिया पोस्ट का मामला बताया गया है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि नायर को सीधे सुप्रीम कोर्ट आने के बजाय पहले संबंधित हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए। अदालत ने यह भी पूछा कि उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका क्यों दायर की, जबकि हाई कोर्ट में अनुच्छेद 226 के तहत राहत मांगी जा सकती है। वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर ने अदालत में कहा कि उनके मुवक्किल के खिलाफ एक ही मामले में कई कानूनी कार्रवाई की जा रही है और यह पत्रकारिता के काम को परेशान करने जैसा है। हालांकि अदालत इस तर्क से सहमत नहीं हुई और नायर को हाई कोर्ट जाने की सलाह दी। बाद में नायर के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी और तब तक किसी भी कार्रवाई से राहत देने की मांग की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम सुरक्षा देने से भी इनकार कर दिया।

यूएई के 500 करोड़ रुपये के विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने यूयू ललित को बनाया मध्यस्थ
सुप्रीम कोर्ट ने संयुक्त अरब अमीरात की अदालत के 500 करोड़ रुपये से जुड़े फैसले के विवाद को सुलझाने के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश यू.यू. ललित को मध्यस्थ नियुक्त किया है। यह मामला आंध्र प्रदेश के एक पुराने बंदरगाह और एयरपोर्ट परियोजना से जुड़ा है।

यूएई की संस्था RAKIA ने हैदराबाद के उद्योगपति निम्मगड्डा प्रसाद पर करीब 120 मिलियन डॉलर के गबन का आरोप लगाया है। अदालत में बताया गया कि प्रसाद पहले ही 125 करोड़ रुपये नकद सुरक्षा के रूप में जमा कर चुके हैं और तेलंगाना की 37 एकड़ जमीन के दस्तावेज भी कोर्ट में जमा किए गए हैं। दोनों पक्षों की सहमति के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने का फैसला किया है।
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चार साल के एलएलबी की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कानूनी शिक्षा में सुधार से जुड़ी एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर अप्रैल में सुनवाई करने पर सहमति दी। याचिका में देश में कानूनी शिक्षा की व्यवस्था की समीक्षा के लिए एक कानूनी शिक्षा आयोग बनाने की मांग की गई है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने वकील अश्विनी उपाध्याय की दलीलों पर ध्यान दिया। उपाध्याय ने वकील अश्विनी दुबे के माध्यम से याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया कि कई देशों में 12वीं के बाद एलएलबी की पढ़ाई चार साल की होती है, जबकि भारत में यह पांच साल की है और इसमें व्यावहारिक प्रशिक्षण की कमी है। 

इसलिए विशेषज्ञों और वरिष्ठ विधि विशेषज्ञों का एक आयोग बनाकर पाठ्यक्रम की समीक्षा की जानी चाहिए और इसे अधिक उपयोगी बनाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता के अनुसार, मौजूदा पांच वर्षीय संयुक्त कानून पाठ्यक्रम में सुधार की जरूरत है, क्योंकि यह प्रतिभाशाली छात्रों को पर्याप्त रूप से आकर्षित नहीं कर पा रहा है। अदालत ने मामले को अप्रैल में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
 
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