सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना सरकार को नोटिस जारी किया है। मामला विपक्षी दल- भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के विधायकों की अयोग्यता से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि विधायकों की अयोग्यता पर विधानसभा अध्यक्ष याचिकाओं पर फैसला लेने में देरी कर रहे हैं। इस मामले में मंगलवार को संक्षिप्त सुनवाई के बाद कोर्ट ने नोटिस जारी किया। अब इस मामले में 25 मार्च को सुनवाई होगी।
सुनवाई से पहले जवाब दाखिल करना होगा
शीर्ष अदालत ने मंगलवार को तेलंगाना सरकार के साथ अन्य पक्षकारों से भी जवाब मांगा। याचिकाओं पर सुनवाई जस्टिस बीआर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ में हो रही है। पीठ ने अगली सुनवाई की तारीख से पहले राज्य सरकार, स्पीकर के अधिकारी, तेलंगाना विधानसभा सचिव, भारत के चुनाव आयोग और दलबदलू विधायकों से जवाब मांगा है।
सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती
अदालत में दाखिल एक याचिका में सत्तारूढ़ कांग्रेस में शामिल हुए तीन बीआरएस विधायकों की अयोग्यता पर तेलंगाना उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई है। एक अन्य याचिका में दलबदल करने वाले सात विधायकों को लेकर अहम सवाल पूछे गए हैं।
गुजरात में न्यायिक मजिस्ट्रेट, सिविल जजों की भर्ती पर सुप्रीम रोक
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (जेएमएफसी) और सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद के लिए भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगा दी। जस्टिस बीआर गवई और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट की ओर से भर्ती प्रक्रिया को जल्दबाजी से आगे बढ़ाने पर नाराजगी व्यक्त की। पीठ ने कहा कि जब शीर्ष अदालत जेएमएफसी और सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के लिए योग्यता निर्धारित करने के मामले की सुनवाई कर रही थी। तो चयन प्रक्रिया में जल्दबाजी की क्या जरूरत है। पीठ ने कहा कि उक्त निर्णय के परिणाम का जेएमएफसी और सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के लिए निर्धारित की जाने वाली योग्यता पर सीधा असर पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ इस सवाल पर विचार कर रही है कि क्या किसी अभ्यर्थी को जेएमएफसी और सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद के लिए आवेदन करने हेतु न्यूनतम योग्यता के रूप में एक विशिष्ट संख्या में वर्ष निर्धारित किए जाने चाहिए। इस मामले में अगली सुनवाई 18 मार्च को होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने RERA की कार्यप्रणाली को निराशाजनक माना
सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण (RERA) की कार्यप्रणाली की आलोचना कर इसे निराशाजनक करार दिया। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ में वरिष्ठ अधिवक्ता के परमेश्वर ने बताया, रेरा कानून का कार्यान्वयन विफल रहा है। निजी बिल्डरों से संबंधित याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, रेरा के तहत नियामक प्राधिकरण की कार्यप्रणाली निराशाजनक है। हालांकि, राज्य नए नियामक उपायों का विरोध कर सकता है। बता दें कि रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016 में बना था। संसद से बने इस कानून का मकसद रियल एस्टेट क्षेत्र को विनियमित करने और आवास परियोजनाओं में निवेश और घर खरीदारों के पैसे की सुरक्षा करना था।
सात अतिरिक्त न्यायाधीश न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत
मद्रास हाईकोर्ट से चार और बॉम्बे हाईकोर्ट से तीन न्यायाधीश सहित सात अतिरिक्त न्यायाधीशों को मंगलवार को स्थायी न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया। विधि मंत्रालय ने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट के एक अतिरिक्त न्यायाधीश को 12 अगस्त से अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में एक साल का नया कार्यकाल दिया गया है। अतिरिक्त न्यायाधीशों को आमतौर पर न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किए जाने से पहले दो साल की अवधि के लिए नियुक्त किया जाता है।
जवाब के लिए उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता को आखिरी मौका
सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षा घेरा हटाने वाली केंद्र सरकार की याचिका पर जवाब देने के लिए उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता को आखिरी मौका दिया। जस्टिस बेला एम त्रिवेदी व जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से कहा कि दुष्कर्म पीड़िता और उसके परिवार के सदस्यों को सुरक्षा कवर की आवश्यकता नहीं है। पीठ ने कहा, उसे आवेदन पर जवाब दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया जाता है। इस मामले में अगली सुनवाई 25 मार्च को होगी।
जनहित याचिकाओं का हो रहा दुरुपयोग : जस्टिस नागरत्ना
सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस बीवी नागरत्ना ने जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि अन्याय से निपटने का एक शक्तिशाली हथियार कुछ लोगों के कार्यों के कारण सकारात्मक दृष्टिकोण के बजाय संदेह की नजर से देखा जाने लगा है।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि पीआईएल कमजोर लोगों के हाथ में एक नेक हथियार है, लेकिन यह अपना गुण खो रही है। उन्होंने कहा, अगर मैं चलती भाषा में बोलूं तो पीआईएल या तो पैसा हित याचिका है, प्रचार हित याचिका है, या निजी हित याचिका है। वह प्रोफेसर उपेंद्र बक्शी की पुस्तक के विमोचन के मौके पर बोल रही थीं। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि प्रोफेसर बक्शी ने पुस्तक में लिखा कि किस प्रकार जनहित याचिकाओं ने न्यायपालिका को मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में कार्य करने में सक्षम बनाकर राज्य को जवाबदेह बनाने के तंत्र के रूप में कार्य किया है। उन्होंने कहा, मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि वह (बक्शी) जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग के बारे में सोचें और लिखें। न्यायाधीश ने कहा कि जरूरत वास्तविक जनहित याचिका या सामाजिक कार्रवाई याचिका की है।
वन व भूमि का रिकॉर्ड तैयार करने के लिए विशेषज्ञ समिति बनाएं राज्य : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने वन जैसे क्षेत्रों, अवर्गीकृत और सामुदायिक वन भूमि सहित भूमि का समेकित रिकॉर्ड तैयार करने के लिए सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को एक महीने के भीतर विशेष समिति गठित करने का निर्देश दिया है।
जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि विशेषज्ञ समिति वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 के नियम 16 (1) के तहत आवश्यक कार्य छह महीने के भीतर पूरा करेगी। पीठ ने कहा कि नियम 16(1) के तहत सभी राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों को ऐसी भूमि का समेकित रिकॉर्ड तैयार करना आवश्यक है, जिसमें विशेषज्ञ समिति की ओर से चिन्हित वन जैसे क्षेत्र, अवर्गीकृत वन भूमि और सामुदायिक वन भूमि शामिल होंगे और जिन पर 2023 के वन संरक्षण कानून के प्रावधान लागू होंगे। शीर्ष अदालत ने 2023 के वन संरक्षण कानून में संशोधन के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।
दोषी राजनेताओं की अयोग्यता कम करने या हटाने पर मांगा ब्योरा
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से आपराधिक मामलों में दोषी राजनेताओं की अयोग्यता अवधि को हटाने या घटाने से संबंधित मामलों का विस्तृत ब्योरा मांगा है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने चुनाव आयोग को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपीए), 1951 की धारा 11 के तहत विवरण प्रस्तुत करने के लिए दो सप्ताह की समय दिया है। आरपीए के तहत आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद नेताओं की चुनावी राजनीति से अयोग्यता की अवधि अपराध और सजा के आधार पर अलग-अलग होती है। दो या अधिक साल की कैद की सजा वाले मामले में, व्यक्ति को दोषी ठहराए जाने की तिथि से रिहाई के छह साल बाद तक अयोग्य ठहराया जाता है, भले ही वह जमानत पर हो या अपील के इंतजार में हो।
शीर्ष अदालत आपराधिक मामलों में दोषी पाए जाने के बाद सांसदों-विधायकों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा कि जनहित याचिका दायर करने वाले अश्विनी उपाध्याय और अन्य, चुनाव आयोग की ओर से ब्योरा प्रस्तुत किए जाने के बाद दो सप्ताह के भीतर चुनाव आयोग के जवाब पर अपना प्रत्युत्तर दाखिल कर सकते हैं।
आईबीसी स्थगन व्यक्तियों को उपभोक्ता कानून के तहत दंड से नहीं बचाता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता के तहत अंतरिम रोक व्यक्तियों या कंपनियों को उपभोक्ता संरक्षण कानूनों के तहत लगाए गए विनियामक दंड से नहीं बचाती है। जस्टिस विक्रम नाथ व जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने कहा, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा 96 के तहत, अंतरिम स्थगन लागू होता है और कॉर्पोरेट देनदार के खिलाफ सभी लंबित कानूनी कार्यवाही को अस्थायी रूप से निलंबित कर देता है। इससे कॉर्पोरेट देनदार के खिलाफ किसी भी फैसले के निष्पादन पर रोक भी लग जाती है।
सारंगा अनिलकुमार अग्रवाल ने तर्क दिया कि वह आईबीसी के तहत राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के समक्ष दिवालियापन की कार्यवाही का सामना कर रहे हैं और इसलिए एनसीडीआरसी (राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग) के आदेश के निष्पादन पर रोक होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, एनसीडीआरसी के लगाए गए दंड प्रकृति में नियामक हैं और आईबीसी के तहत ‘ऋण’ नहीं हैं। आईबीसी की धारा 96 के तहत स्थगन उपभोक्ता संरक्षण कानूनों के अनुपालन न करने पर लगाए गए नियामक दंडों तक नहीं फैलता है। इस टिप्पणी के साथ पीठ ने आवासीय इकाइयों के कब्जे में देरी से जुड़े एक मामले में एनसीडीआरसी के लगाए जुर्माने पर रोक की मांग वाली अपील खारिज कर दी।
पॉक्सो केस सुनने के लिए ट्रायल अदालतों में पर्याप्त जज नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसके पॉक्सो मामलों में प्रत्येक जिले में विशेष अदालत स्थापित करने जैसे आदेशों को लागू करने के लिए देश की ट्रायल अदालतों में पर्याप्त जज नहीं हैं। जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ बच्चों के साथ दुष्कर्म मामलों की संख्या में चिंताजनक वृद्धि से संबंधित 2019 के एक स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई कर रही थी। शीर्ष अदालत ने 2019 में कई निर्देश पारित किए, जिसमें पॉक्सो कानून के तहत 100 से अधिक एफआईआर वाले जिले में विशेष अदालत स्थापित करना शामिल था। जस्टिस त्रिवेदी ने कहा कि जिला अदालतों में खाली पदों को ध्यान में रखते हुए कुछ निर्देश अभी भी लागू नहीं हो पाए हैं।
विधायकों की अयोग्यता पर फैसले में देरी...तेलंगाना को सुप्रीम नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष की ओर से कांग्रेस में शामिल हुए बीआरएस विधायकों की अयोग्यता की याचिकाओं पर फैसला करने में देरी के लिए तेलंगाना सरकार व अन्य को नोटिस जारी किया। जस्टिस बीआर गवई व जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मामले की सुनवाई 25 मार्च के लिए तय की है। एक याचिका में सत्तारूढ़ कांग्रेस में शामिल हुए तीन बीआरएस विधायकों को अयोग्य ठहराने के तेलंगाना हाईकोर्ट के नवंबर 2024 के आदेश को चुनौती दी गई है, जबकि दूसरी याचिका दलबदल करने वाले शेष सात विधायकों के बारे में है।