क्या मुस्लिम कानून के तहत विरासत अधिकारों पर फैसले में हिंदू कानून लागू होंगे...होगी जांच
सुप्रीम कोर्ट यह परीक्षण करने के लिए तैयार हो गया है कि क्या मुस्लिम कानून के तहत विरासत के अधिकारों पर फैसला करते समय हिंदू कानून के सिद्धांतों को लागू किया जा सकता है। जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने बंटवारे के एक मामले में नोटिस जारी करते हुए आदेश दिया है।
दरअसल, वादी (सिराजुद्दीन और फयाजुद्दीन) प्रतिवादी नंबर 2 (रियाजुद्दीन) की पहली शादी से उसके बेटे हैं। उन्होंने अपने वैध हिस्से का दावा करते हुए बंटवारे का मुकदमा दायर किया था। उन्होंने तर्क दिया था कि पिता ने अन्य महिला से अवैध रिश्ता कायम किया और उससे उसे दो बच्चे हैं। आरोप लगाया गया कि पिता ने भी जानबूझकर उन्हें और उनकी मां को छोड़ दिया। जब पैतृक संपत्ति के बंटवारे की मांग की तो पिता ने इससे इन्कार कर दिया, जिसके बाद मुकदमा दायर किया गया।
हाईकोर्ट में पिता ने तर्क दिया कि उसने अपनी पहली पत्नी को तलाक दे दिया था और स्थायी गुजारा भत्ता के लिए एक निश्चित राशि का भुगतान भी किया था। वादी की मां ने राशि स्वीकार कर ली और संपत्तियों पर अपना अधिकार छोड़ दिया। पुत्रों ने तर्क दिया कि ‘कर्ता’ के अलावा कोई भी व्यक्ति त्याग नहीं कर सकता है। मां कर्ता नहीं है। वह नाबालिग बच्चों के शेयर नहीं छोड़ सकती। हाईकोर्ट ने माना कि मां नाबालिग बच्चों का अधिकार नहीं छोड़ सकती और अपील की अनुमति दी।
पिता ने किया सुप्रीम कोर्ट का रुख
पिता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम परिवार में विभाजन विवाद को निपटाने के लिए एक हिंदू अविभाजित परिवार के कर्ता पर लागू सिद्धांतों को लागू करने में गलती की है।
अपराध इसलिए नहीं किया गया कि पीड़िता एससी वर्ग से थी...आरोपी बरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अनुसूचित जाति (एससी) की किसी महिला का अपमान करने, उसकी लज्जा भंग करने या हमला करने के अपराध में आरोपी को केवल तभी दोषी ठहराया जा सकता है, जब अपराध सिर्फ इसलिए किया गया हो कि पीड़िता एससी जाति से थी। इस टिप्पणी के साथ पीठ ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपीलकर्ता दशरथ साहू की सजा रद्द कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफआईआर के अनुसार, पीड़िता घरेलू सहायिका थी तो अपीलकर्ता ने उसकी लज्जा भंग करने की कोशिश की। ऐसे में यहां तक कि पीड़िता के उच्चतम आरोपों को लें, आरोपी ने आपत्तिजनक कृत्य इस इरादे से नहीं किया कि वह अनुसूचित जाति से संबंधित व्यक्ति के साथ ऐसा कर रहा था।