सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली सरकार को राष्ट्रीय राजधानी में सेवाओं को नियंत्रित करने में निर्वाचित आप सरकार पर उपराज्यपाल की प्रधानता स्थापित करने वाले केंद्र सरकार के अध्यादेश को चुनौती देने वाली अपनी याचिका में संशोधन करने की अनुमति दी। अध्यादेश के स्थान पर कानून बनने के बाद याचिका में संशोधन करना जरूरी हो गया था। शीर्ष अदालत ने दिल्ली सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक सिंघवी की दलीलों पर ध्यान दिया कि पहले चुनौती उस अध्यादेश के खिलाफ थी जो अब संसद के दोनों सदनों से पारित होने और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद कानून बन गया है।
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, अंतरिम आवेदन उस रिट याचिका में संशोधन की मांग करता है जिसके द्वारा एनसीटी अध्यादेश को चुनौती दी गई थी। अब, इसे एक अधिनियम (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक 2023) द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है। हमने वकील की बात सुनी है। सॉलिसिटर जनरल का कहना है कि उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। संशोधन के लिए आवेदन की अनुमति है। जवाबी हलफनामा (केंद्र का जवाब) यदि कोई हो, तो चार सप्ताह के भीतर दाखिल किया जा सकता है।
संसद ने हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक 2023 को मंजूरी दी है, जिसे दिल्ली सेवा विधेयक भी कहा जाता है। इसके तहत उपराज्यपाल को सेवा मामलों पर व्यापक नियंत्रण का अधिकार दिया गया है। राष्ट्रपति की सहमति के बाद यह विधेयक कानून बन गया है। इससे पहले, शीर्ष अदालत ने केंद्र के 19 मई के अध्यादेश को चुनौती देने वाली दिल्ली सरकार की याचिका को पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेज दिया था, जिसने शहर की व्यवस्था से सेवाओं पर नियंत्रण छीन लिया था और दो सत्ता केंद्रों के बीच एक नया विवाद शुरू कर दिया था।
ट्रांसजेंडरों के लिए आरक्षण की मांग वाली याचिका पर मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक रोजगार और शिक्षा में ट्रांसजेंडर लोगों के लिए आरक्षण की मांग करने वाली याचिका पर शुक्रवार को केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगा। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ केरल के एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
जब याचिकाकर्ता के वकील ने पीठ से कहा कि याचिका में सरकारी रोजगार और शिक्षा में ट्रांसजेंडर लोगों के लिए आरक्षण की मांग की गई है, तो पीठ ने शुरू में उनसे कहा कि आप उच्च न्यायालय क्यों नहीं जाते? हर कोई (अनुच्छेद) 32 के तहत क्यों आता है? आप उच्च न्यायालय का रुख करें।
वकील ने तब पीठ से कहा कि उन्होंने शीर्ष अदालत का रुख किया है क्योंकि याचिका में सभी राज्यों को पक्षकार बनाया गया है, जिसके बाद अदालत नरम हुई और नोटिस जारी किए। संविधान का अनुच्छेद 32 भारतीय नागरिकों को उचित कार्यवाही के माध्यम से अपने मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए सीधे शीर्ष अदालत में जाने का अधिकार देता है।
जी-20 शिखर सम्मेलन के मद्देनजर 8 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में छुट्टी रहेगी
शीर्ष अदालत द्वारा जारी एक अधिसूचना में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट आठ सितंबर को बंद रहेगा और भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने राष्ट्रीय राजधानी में जी20 शिखर सम्मेलन के मद्देनजर शुक्रवार को छुट्टी की घोषणा की। जी20 शिखर सम्मेलन 9 और 10 सितंबर को दिल्ली में होगा।
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर जारी एक अधिसूचना में कहा गया है कि सीजेआई ने कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय द्वारा जारी 24 अगस्त के कार्यालय ज्ञापन पर विचार करते हुए शीर्ष अदालत के लिए आठ सितंबर को अवकाश घोषित किया है। कार्मिक मंत्रालय द्वारा गुरुवार को जारी एक आदेश के अनुसार, जी20 शिखर सम्मेलन के मद्देनजर राष्ट्रीय राजधानी में सभी केंद्र सरकार के कार्यालय 8 से 10 सितंबर तक बंद रहेंगे।
आपराधिक मामले में आरोपी परीक्षण पहचान परेड के लिए बाध्य : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत जांच के दौरान परीक्षण पहचान परेड (टीआईपी) के लिए जाना बाध्यता है। इससे किसी तरह के सांविधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं होता है।
जस्टिस एमएम सुंद्रेश और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने एक फैसले में यह टिप्पणी की जिसमें उसने हत्या के एक मामले में दोषी की अपील खारिज कर दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि टीआईपी संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत एक अभियुक्त के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता है, जिसमें यह प्रावधान है कि किसी भी आरोपी को अपने खिलाफ गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। पीठ ने कहा, केवल टीआईपी में शामिल होने का मतलब खुद के खिलाफ गवाह बनना नहीं है।
पीठ इस सवाल पर विचार कर रही थी कि क्या कोई आरोपी इस आधार पर टीआईपी में भाग लेने से इन्कार कर सकता है कि उसे टीआईपी में हिस्सा लेने से पहले ही चश्मदीदों को दिखाया गया था। ऐसी स्थिति में टीआईपी का हिस्सा बनना उसके लिए खुद के खिलाफ गवाह बनने से कम नहीं होगा। शीर्ष अदालत ने हत्या के मामले में निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ मुकेश सिंह नामक दोषी की अपील खारिज कर दी। निचली अदालत ने मुकेश सिंह और दो अन्य को हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई थी।