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SC Updates: मथुरा की शाही मस्जिद ईदगाह समिति ने खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा; इस याचिका में दखल की मांग की

Wed, 11 Dec 2024 02:26 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Supreme Court - फोटो : ANI
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मथुरा की शाही मस्जिद ईदगाह समिति ने सुप्रीम कोर्ट में एक आवेदन दायर किया जिसमें पूजा स्थल अधिनियम, 1991 को चुनौती देने वाली याचिकाओं में हस्तक्षेप करने की मांग की गई। 

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समिति का कहना है कि पूजा स्थल अधिनियम के खिलाफ याचिकाओं पर निर्णय से आवेदक पर सीधे तौर पर असर पड़ने की संभावना है (क्योंकि वह कृष्ण जन्मभूमि के संबंध में दावों का विरोध कर रहा है)।

तमिलनाडु से मंदिरों के लिए ट्रस्टी समिति की नियुक्ति के संबंध में उठाए कदमों के बारे में पूछा

सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तमिलनाडु सरकार को राज्य में सभी हिंदू मंदिरों के लिए अरंगवलर समिति (ट्रस्टी समिति) की नियुक्ति के संबंध में उठाए जाने वाले कदम के बारे में बताने का निर्देश दिया। 
 
न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने तमिलनाडु सरकार के वकील से कहा, 'आप (राज्य सरकार) क्या करने वाले हैं, इस बारे में हलफनामा दाखिल करें।'

यह निर्देश तब आया जब राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया कि उसने 31,000 मंदिरों से ट्रस्टी समितियों की नियुक्ति के लिए आवेदन मांगे थे और ऐसे पैनल 7,500 से अधिक मंदिरों में नियुक्त किए गए हैं, क्योंकि कई मंदिरों ने अभी तक जवाब नहीं दिया है।

पीठ ने राज्य सरकार को हलफनामा दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया और याचिकाकर्ता हिंदू धर्म परिषद की याचिका को फरवरी, 2025 में सूचीबद्ध किया। राज्य सरकार के वकील ने कहा कि सरकार द्वारा इस संबंध में विज्ञापन जारी करने के बावजूद मंदिरों के ट्रस्ट में नियुक्ति के लिए बहुत कम लोग सामने आए। याचिकाकर्ता निकाय के वकील ने दावा किया कि राज्य में लगभग 40,000 मंदिर हैं और रखरखाव न होने के कारण कई पुराने मंदिर क्षतिग्रस्त हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि भक्तों द्वारा दिए जाने वाले चढ़ावे का कम से कम 10 प्रतिशत मंदिरों के रखरखाव पर खर्च किया जाना चाहिए।

पीठ नौ दिसंबर, 2021 के मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता की अपील पर सुनवाई कर रही थी, जब न्यायमूर्ति पुष्पा सत्यनारायण ने राज्य के सभी हिंदू मंदिरों के लिए अरंगवलर समिति की नियुक्ति की याचिका खारिज कर दी थी।उच्च न्यायालय में दायर याचिका में मंदिर के मामलों के प्रबंधन के लिए ऐसी समितियों में एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश, एक सामाजिक कार्यकर्ता, एक भक्त, अनुसूचित जाति के एक व्यक्ति के अलावा एक महिला को शामिल करने की मांग की गई थी।

प्राचीन पूजा को बंद करने के फैसले पर केरल मंदिर समिति को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)
सुप्रीम कोर्ट बुधवार को केरल हाईकोर्ट के गुरुवायुर श्री कृष्ण मंदिर के प्रशासन के पक्ष में दिए गए आदेश के खिलाफ एक याचिका पर विचार करने के लिए सहमत हो गया, जिसने एकादशी पर 'उदयस्थमान पूजा' की प्राचीन परंपरा को बंद करने का फैसला किया था।
 
न्यायमूर्ति जे के माहेश्वरी और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल की पीठ ने सात दिसंबर के आदेश के खिलाफ याचिका पर केरल सरकार और गुरूवयूर देवस्वओम प्रबंधन समिति को नोटिस जारी किया। हालांकि, शीर्ष अदालत ने कहा कि मंदिर की वेबसाइट पर प्रदर्शित दैनिक पूजा के चार्ट में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। 

पीठ ने कहा, 'हम अब हस्तक्षेप नहीं कर सकते। हम दूसरे पक्ष को नोटिस जारी करेंगे। प्रथम दृष्टया हम संतुष्ट हैं।'

मंदिर प्रशासन ने हाल ही में भीड़ प्रबंधन पर कठिनाइयों का हवाला देते हुए एकादशी पर अनुष्ठान नहीं करने का फैसला किया था और अधिक भक्तों को दर्शन के लिए समय देने की इच्छा का हवाला दिया था। 

दिव्यांग के दाखिले में लापरवाही...सुप्रीम कोर्ट ने शीर्ष केंद्रीय अधिकारी किए तलब
 सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांग श्रेणी के एक अभ्यर्थी को मेडिकल में प्रवेश देने के मामले में लापरवाहीपूर्ण रवैया अपनाए जाने पर चिंता जताई। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय के महानिदेशक से बृहस्पतिवार को सुबह 10:30 बजे अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा।

जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दिव्यांग व्यक्तियों की श्रेणी से संबंधित याचिकाकर्ता के प्रवेश से जुड़े मामले में विधिवत नोटिस दिए जाने के बावजूद कोई भी उपस्थित नहीं हुआ। सामान्यतः न्यायालय सरकारी अधिकारियों को उपस्थित रहने का निर्देश नहीं देता। लेकिन लापरवाह रवैये को देखते हुए हम महानिदेशक, स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश देने को बाध्य हैं। पीठ पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के 23 सितंबर के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। हाईकोर्ट ने 2024-25 शैक्षणिक सत्र के लिए एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश के इच्छुक उम्मीदवार की याचिका को खारिज कर दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना मामले में रिलायंस की कंपनी को दिया नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने एक अवमानना याचिका पर रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्टर लि. की सहायक कंपनी दिल्ली एयरपोर्ट मेट्रो एक्सप्रेस प्रा. लि. (डीएएमईपीएल) को नोटिस जारी किया है। दिल्ली मेट्रो रेल निगम (डीएमआरसी) ने यह अवमानना याचिका दायर की है और डीएएमईपीएल पर ब्याज समेत 4,500 करोड़ रुपये नहीं लौटाने का आरोप लगाया है।

जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने डीएमआरसी की याचिका पर संज्ञान लेते हुए डीएएमईपीएल को नोटिस जारी करते हुए पूछा कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी (पीएसयू) को पैसे नहीं लौटने पर क्यों न उसके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाए। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी को सूचीबद्ध की है।

10 अप्रैल को, शीर्ष अदालत ने अपने ही फैसले को रद्द करते हुए कहा था कि पीएसयू 2017 के मध्यस्थ फैसले के मुताबिक डीएएमईपीएल को 8,000 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं था। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की अध्यक्षता वाली पीठ के 2021 के फैसले के खिलाफ डीएमआरसी की उपचारात्मक याचिका स्वीकार कर ली थी और कहा था कि सीजेआई की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर गलती की थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2019 के अपने फैसले में डीएमआरसी के खिलाफ मध्यस्थ के फैसले को रद्द कर दिया था।

शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में डीएएमईपीएल से 2,500 रुपये डीएमआरसी को वापस करने को कहा था, जो वह प्राप्त कर चुकी थी।

हाथ से मैला ढोने की प्रथा खत्म होना जरूरी, केंद्र ने अब तक क्या किया  
 सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि चरणबद्ध तरीके से देश में हाथ से मैला ढोने की प्रथा पूरी तरह खत्म करने के उसके निर्देश के बारे में उठाए गए कदमों पर रिपोर्ट दाखिल करे। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि इस प्रथा का पूरी तरह खत्म होना जरूरी है। जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अरविंद कुमार ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एश्वर्या भार्टी से कहा कि इस बारे में सभी भागीदार पक्षों की केंद्रीय निगरानी समिति के साथ दो सप्ताह के अंदर बैठक आयोजित की जाए। यह निगरानी समिति मैला ढोने वालों की नियुक्ति पर रोक और पहले से इस काम में लगे लोगों के पुनर्वास के लिए बनाए गए 2013 के कानून के लागू होने पर नजर रखती है।

पीठ ने कहा, इस अदालत की ओर से 2023 में पारित आदेश में कहा गया था तकनीक के विकास को देखते हुए मानवीय रूप से मैला साफ करने की प्रथा को पूरी तरह खत्म करना संभव है। हालांकि, ऐसा अब तक नहीं हुआ है। ऐसा लगता है कि इस बारे में अब भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। शीर्ष कोर्ट ने यह देखते हुए कि हाथ से मैला ढोने के काम में शामिल लोगों की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती और उनकी स्थिति अमानवीय है, 2023 में केंद्र और राज्य सरकारों को उचित उपाय करने, नीतियां बनाने और यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि चरणबद्ध तरीके से इस प्रथा को पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा।
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सरिस्का अभयारण्य...मंदिर आने वाले भक्तों की भावनाओं का भी रखें ध्यान
 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरिस्का टाइगर रिजर्व में पांडुपोल हनुमान मंदिर में दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की भावनाओं का ख्याल रखते हुए इस बाघ अभयारण्य की रक्षा की जानी चाहिए।

जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने बुधवार को कहा कि निजी वाहनों को तत्काल रोक दिए जाने से मंगलवार और शनिवार को मंदिर में दर्शन करने वाले हजारों श्रद्धालुओं को दर्शन से वंचित होना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) ने अपनी रिपोर्ट में सरिस्का टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में प्रसिद्ध पांडुपोल हनुमान मंदिर में निजी वाहनों की अनियंत्रित आवाजाही के कारण वन्यजीवों को होने वाले नुकसान पर चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने पहले राजस्थान सरकार से सीईसी की रिपोर्ट पर जवाब मांगा था, जिसमें सरिस्का टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों को होने वाले नुकसान पर चिंता जताई गई थी।
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