जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में अवैध निर्माण व बफर क्षेत्र में बाघ सफारी स्थापित करने से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई। शीर्ष अदालत ने जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में अवैध निर्माण, पेड़ों की कटाई की अनुमति देने के लिए उत्तराखंड के पूर्व वन मंत्री हरक सिंह रावत और पूर्व प्रभागीय वन अधिकारी किशन चंद को फटकार लगाई।
सांठगांठ के चलते पर्यावरण को हुआ नुकसान
न्यायमूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति पी के मिश्रा और संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि साल 2021 में वन मंत्री रहे रावत और पूर्व प्रभागीय वन अधिकारी के वैधानिक प्रावधानों को पूरा करने के दुस्साहस से हैरान हैं। अदालत ने फटकार लगाते हुए कहा कि राजनेताओं और वन अधिकारियों के बीच सांठगांठ के चलते पर्यावरण को भारी नुकसान हुआ है। राज्य प्रशासन और राजनेताओं ने सार्वजनिक विश्वास के सिद्धांत को कूड़ेदान में फेंक दिया है।
फिलहाल कोई टिप्पणी नहीं कर सकते
पीठ ने कहा, 'मामला जांच के लिए सीबीआई के पास है। इसलिए हम इस मामले में फिलहाल कोई टिप्पणी नहीं कर सकते हैं। इसके अलावा हमने नोटिस किया है कि यह काम केवल दो व्यक्तियों द्वारा नहीं किया जा सकता है। इसमें कई अन्य लोग भी शामिल होंगे।'
शीर्ष अदालत ने पहले से ही मामले की जांच कर रही केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को तीन महीने के भीतर मामले में अपनी स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा, 'यह एक ऐसा मामला है, जहां राज्य प्रशासन और राजनेताओं ने सार्वजनिक विश्वास के सिद्धांत को कूड़ेदान में फेंक दिया है।'
गौरव बंसल की याचिका पर सुनवाई
बता दें, शीर्ष अदालत पर्यावरण कार्यकर्ता और वकील गौरव बंसल की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में सडाउन वन प्रभाग में बाघों की संख्या कम होने का आरोप लगाया गया है। इसके पीछे का कारण बाघों के घरों को नष्ट करना और टाइगर सफारी में अवैध निर्माण के साथ-साथ हजारों पेड़ों की अवैध कटाई बताया गया है।
सीबीआई को अंतरिम रिपोर्ट देने का निर्देश
जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में बाघ सफारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर वकील गौरव कुमार बंसल ने कहा, 'सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को जांच पर अंतरिम रिपोर्ट प्रदान करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा, अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि सफारी बफर क्षेत्र में हो सकती है या नहीं यह बताया जाए।'
पीठ ने कहा कि राज्य जंगल को सुधारने के अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हट सकता। अदालत ने कहा, 'रावत और चंद कानून की अवहेलना करते हुए और वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए पर्यटन को बढ़ावा देने की आड़ में इमारतों के निर्माण के लिए पेड़ों की सामूहिक कटाई जैसे अपराध में शामिल रहे हैं।'
पीठ ने एक समिति बनाई, जो यह पता लगाएगी कि क्या राष्ट्रीय उद्यानों के बफर या फ्रिंज क्षेत्रों में बाघ सफारी की अनुमति दी जा सकती है या नहीं।
यह है मामला
सुप्रीम कोर्ट की केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने इससे पहले रावत और चंद को कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (सीटीआर) के कालागढ़ वन प्रभाग के पखरो और मोरघट्टी वन क्षेत्रों में 2021 में टाइगर सफारी के संबंध में निर्माण सहित विभिन्न अवैध गतिविधियों के लिए जिम्मेदार ठहराया था। समिति ने शीर्ष अदालत को सौंपी अपनी रिपोर्ट में रावत और चंद को अवैध गतिविधियों का दोषी ठहराया है। साथ ही उत्तराखंड सतर्कता विभाग को अनियमितताओं में शामिल वन अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई जारी रखने का निर्देश दिया है।
समिति ने कहा था कि जब मीडिया पखरो और मोरघट्टी में सभी प्रकार की गड़बड़ियों की रिपोर्टिंग कर रहा था, तब तत्कालीन मुख्य वन्यजीव वार्डन और राज्य सरकार ने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की।
इससे पहले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने टाइगर रिजर्व में अवैध निर्माण के संबंध में रावत और चंद के आवासों पर छापा मारा था।
बता दें, रॉयल बंगाल टाइगर के लिए प्रसिद्ध कॉर्बेट टाइगर रिजर्व मानसून के दौरान पर्यटकों के लिए बंद रहता है और अक्टूबर-नवंबर में खुलता है। 1,288.31 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला यह अपनी जैव विविधता के लिए जाना जाता है और यहां के बाघों का घनत्व दुनिया में सबसे ज्यादा है।