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Supreme Court: 'बंधुआ मजदूरों की तरह डॉक्टर रोज 16-20 घंटे काम कर रहे हैं', NMC पर भड़का सुप्रीम कोर्ट

Mon, 16 Oct 2023 10:56 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

MBBS इंटर्न को स्टाइपेंड नहीं देने पर सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत ने सवाल किया कि 'बंधुआ मजदूरों की तरह डॉक्टर रोज 16-20 घंटे काम कर रहे हैं, स्टाइपेंड का भुगतान क्यों नहीं किया जा रहा है?
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supreme court - फोटो : ANI
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विस्तार
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मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के दौरान एमबीबीएस के कोर्स में इंटर्नशिप का भी प्रावधान है। युवा डॉक्टरों को इंटर्नशिप के बदले मेडिकल कॉलेजों में स्टाइपेंड दिया जाता है। देश में 70 फीसद इंटर्न को स्टाइपेंड का भुगतान न किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) को फटकार लगाई है। वजीफा का भुगतान न करने पर उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) को कड़ी फटकार लगाई और कहा, "राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग क्या कर रहा है? ये युवा डॉक्टर प्रतिदिन 16-20 घंटे काम कर रहे हैं... यह बंधुआ मजदूरी की तरह है।"
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नियामक के रूप में क्या कर रहा है NMC
दरअसल, देश के लगभग 70 प्रतिशत मेडिकल कॉलेजों पर एमबीबीएस इंटर्न को अनिवार्य वजीफे का भुगतान नहीं करने का आरोप लगा है। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, निजी मेडिकल कॉलेज, एडमिशन के समय समय भारी दान या कैपिटेशन फीस लेते हैं। इसके बावजूद एमबीबीएस प्रशिक्षुओं को अनिवार्य वजीफा का भुगतान नहीं कर रहे हैं। एनएमसी नियामक के रूप में क्या कर रहा है?

एमबीबीएस इंटर्न को अनिवार्य वजीफा का भुगतान नहीं
कोर्ट की यह टिप्पणी तब आई जब एक वकील ने दोहराया कि देश के 70 प्रतिशत मेडिकल कॉलेज एमबीबीएस इंटर्न को अनिवार्य वजीफा का भुगतान नहीं कर रहे हैं। इस पर एनएमसी के वकील ने जानकारी जुटाने के लिए कुछ समय मांगा। शीर्ष अदालत ने एनएमसी को समय दे दिया।
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शुल्क नियामक प्राधिकरण की स्थापना क्यों नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने आर्मी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसीएमएस) की दलीलों पर ध्यान देने के बाद दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया। अदालत ने पूछा कि इंटर्नशिप के दौरान स्टाइपेंड के भुगतान जैसे मुद्दों से निपटने के लिए राष्ट्रीय राजधानी में शुल्क नियामक प्राधिकरण की स्थापना क्यों नहीं की गई है?

25,000 रुपये का मासिक वजीफा देने का निर्देश
इससे पहले बीते 15 सितंबर को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने देश में चिकित्सा शिक्षा के लिए सर्वोच्च शासी निकाय- एनएमसी से कहा था कि क्या 70 फीसद एमबीबीएस इंटर्न को अनिवार्य वजीफे का भुगतान नहीं कर रहे हैं? अदालत ने एसीएमएस को 1 अक्टूबर से अपने एमबीबीएस प्रशिक्षुओं को 25,000 रुपये का मासिक वजीफा देने का भी निर्देश दिया था।

पांच छात्रों की याचिका, देश के 70 फीसद कॉलेज की पोल खुली
वजीफा मांगने वाले छात्रों की ओर से पेश वकील वैभव गग्गर ने कहा था कि एनएमसी की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 70 फीसदी मेडिकल कॉलेज अपने प्रशिक्षुओं को वजीफा नहीं दे रहे हैं। बता दें कि शीर्ष अदालत आर्मी वेलफेयर एजुकेशन सोसाइटी (एडब्ल्यूईएस) की तरफ से स्थापित और गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय से संबद्ध एसीएमएस में पढ़ने वाले पांच एमबीबीएस छात्रों की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सभी छात्र अपनी इंटर्नशिप के लिए स्टाइपेंड मांग रहे थे।

चीफ जस्टिस बोले- सप्रीम कोर्ट में लॉ क्लर्क को 80 हजार मिलते हैं
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी अपने लॉ क्लर्कों को वजीफे के रूप में 80,000 रुपये का भुगतान करता है। कॉलेज एमबीबीएस इंटर्न को 1 लाख रुपये का भुगतान क्यों नहीं कर सकता है? एसीएमएस की ओर से पेश वरिष्ठ वकील आर बालासुब्रमण्यम ने कहा था कि कॉलेज का सेना से कोई लेना-देना नहीं है। इसे रक्षा मंत्रालय से कोई सहायता नहीं मिलती है। अन्य मेडिकल कॉलेजों द्वारा भुगतान की जाने वाली वजीफे की विभिन्न राशियों की तुलना करने के बाद, पीठ ने एसीएमएस को 1 अक्टूबर से अपने प्रशिक्षुओं को 25,000 रुपये प्रति माह का भुगतान शुरू करने का निर्देश दिया था।
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