सुप्रीम कोर्ट ने जमानत प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जमानत की मांग करने वाले हर अभियुक्त को अपने आपराधिक इतिहास का पूरा खुलासा हलफनामे के साथ करना अनिवार्य होगा। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि जमानत याचिका दाखिल करते समय आरोपी की जिम्मेदारी है कि वह सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को निष्पक्ष और स्पष्ट रूप से अदालत के सामने रखे। यदि कोई तथ्य छिपाया जाता है या आंशिक जानकारी दी जाती है, तो इसे कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।
कोर्ट ने कहा कि जमानत पर फैसला केवल कानूनी औपचारिकता नहीं है, बल्कि न्यायिक विवेक का गंभीर प्रयोग है। इसलिए अदालत के समक्ष पूरी सच्चाई रखना आवश्यक है।
जमानत आवेदन में क्या-क्या बताना होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि जमानत याचिका में निम्नलिखित जानकारियां अनिवार्य रूप से शामिल हों:-
- FIR नंबर और तारीख
- संबंधित पुलिस थाने का नाम
- जांच एजेंसी द्वारा लगाई गई धाराएं
- आरोपित अपराध की अधिकतम सजा
- लंबित गैर-जमानती वारंट या घोषित अपराधी (Proclaimed Offender) जैसी कार्यवाही का विवरण
न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखना अनिवार्य
अदालत ने यह भी कहा कि इस निर्णय की प्रति सभी उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों को भेजी जाए, ताकि वे अपने नियमों में आवश्यक संशोधन या प्रशासनिक दिशा-निर्देश जारी कर सकें। यह आदेश उस मामले में आया, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा फर्जी डिग्री प्रमाणपत्र जारी करने के आरोपी को दी गई जमानत को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए पूर्ण और ईमानदार खुलासा अनिवार्य है। जमानत का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन यह पारदर्शिता और सत्यनिष्ठा की शर्त पर ही मिल सकता है।
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