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Supreme Court judge: जस्टिस विक्रम नाथ ने दिया पीएम मोदी के रुख का हवाला, बोले- वैश्विक लक्ष्य में घरेलू हितों को नहीं भूलना चाहिए

Sun, 03 Jul 2022 09:06 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने मौलिक कर्तव्यों के बारे में बोलते हुए कहा कि भारतीय संविधान के तहत मौलिक कर्तव्य हमेशा अधिकारों से पहले रहे हैं। अधिकारों और कर्तव्यों के उचित संतुलन में, सामाजिक संरचना के प्रति कर्तव्य पहले आता है, उसके बाद व्यक्तिगत अधिकारों का दावा किया जाता है।
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न्यायमूर्ति विक्रम नाथ - फोटो : social media
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विस्तार
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उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने रविवार को पीएम मोदी का हवाला देते हुए कहा कि वैश्विक लक्ष्य लेते समय घरेलू हितों को नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारे प्रधान मंत्री बार-बार 'विश्व स्तर पर सोचने लेकिन स्थानीय रूप से कार्य करने'  के दृष्टिकोण पर जोर देते हैं, जिसका अर्थ है कि हमारा दृष्टिकोण विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए होना चाहिए, इसके साथ ही देश में हमारे चारों ओर के हितों और अधिकारों के बारे में समान रूप से चिंतित होना चाहिए।

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न्यायमूर्ति नाथ ने न्यायमूर्ति एच आर खन्ना राष्ट्रीय संगोष्ठी में मौलिक अधिकारों के साथ-साथ मौलिक अधिकारों के विषय पर बोलते हुए ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि अधिकारों के सम्मान की अपेक्षा करने से पहले कर्तव्यों को पूरा किया जाना चाहिए। इस संगोष्ठी का आयोजन वस्तुतः डॉ राम मनोहर लोहिया नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, लखनऊ और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, ओडिशा द्वारा नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज CAN फाउंडेशन के पूर्व छात्रों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था। न्यायाधीश ने कहा कि जब हम अपने अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों को आगे बढ़ाते हैं, तो घरेलू हितों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।

उन्होंने मौलिक कर्तव्यों के बारे में बोलते हुए कहा कि भारतीय संविधान के तहत मौलिक कर्तव्य हमेशा अधिकारों से पहले रहे हैं।  अधिकारों और कर्तव्यों के उचित संतुलन में, सामाजिक संरचना के प्रति कर्तव्य पहले आता है, उसके बाद व्यक्तिगत अधिकारों का दावा किया जाता है।
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न्यायमूर्ति नाथ ने कहा कि अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। हमारी विविधताओं से भरी आबादी के लिए सुरक्षा और समानता की भावना सुनिश्चित करने के लिए मौलिक अधिकारों को हमारे संविधान में शामिल किया गया था, लेकिन वे अकेले खड़े नहीं हो सकते हैं और मौलिक कर्तव्यों के साथ-साथ उन्हें पढ़ना होगा। उन्होंने आगे कहा, प्रत्येक मौलिक अधिकार के लिए एक मौलिक कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता है तो एक कल्याणकारी और शांतिपूर्ण समाज के अधिकारों और कर्तव्यों की अवधारणा अर्थहीन हो जाती है। 

सुप्रीम कोर्ट के जज न्यायमूर्ति नाथ ने कहा कि मौलिक कर्तव्य हमेशा अधिकारों से पहले रहे हैं और उन्हें पूरी तरह से देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई फैसलों में उसी विचार को दोहराया है। सुप्रीम कोर्ट के जज ने समझाया कि जीवन का रथ अधिकारों और कर्तव्यों के दो पहियों से चलता है और कर्तव्य हमेशा किसी भी समाज में किसी भी युग में अधिकारों के अस्तित्व से पहले रहे हैं।

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