जामियत उलमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के कुछ हालिया सार्वजनिक बयानों के खिलाफ याचिका दायर की है। संगठन ने इन टिप्पणियों को सांप्रदायिक, गहराई से विभाजनकारी और संविधान की भावना के विपरीत बताया है।
याचिका जामियत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदानी द्वारा वरिष्ठ वकील एम आर शमशाद के माध्यम से दाखिल की गई है। इसमें शीर्ष अदालत से यह अनुरोध किया गया है कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए सख्त और लागू होने योग्य दिशानिर्देश बनाए जाएं, ताकि सार्वजनिक पदों का उपयोग किसी समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने या उसे लक्षित करने के लिए न किया जा सके।
याचिका में असम सीएम द्वारा दिए गए भाषण का जिक्र
याचिका में विशेष रूप से 27 जनवरी को असम सीएम द्वारा दिए गए भाषण का जिक्र किया गया है, जिसमें उन्होंने कथित रूप से एक अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं। जामियत उलमा-ए-हिंद का कहना है कि ऐसे बयानों को सिर्फ राजनीतिक भाषण या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में नहीं डाला जा सकता। याचिका में कहा गया है कि ये टिप्पणियां सामाजिक सौहार्द को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाती हैं, पूरे समुदाय के खिलाफ शत्रुता पैदा करती हैं और संवैधानिक पद की गरिमा और जिम्मेदारी का उल्लंघन करती हैं।
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इसके अलावा आवेदन में सुप्रीम कोर्ट से यह भी अनुरोध किया गया है कि संवैधानिक पदाधिकारियों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश तय किए जाएं, ताकि कोई व्यक्ति अपने पद का इस्तेमाल सांप्रदायिक नफरत फैलाने, जनता में वैमनस्य पैदा करने या किसी समूह को बदनाम करने के लिए न कर सके। याचिका में यह भी कहा गया है कि इस तरह के दिशानिर्देश संविधान और कानून से ऊपर कोई नहीं है के मूल सिद्धांत को मजबूत करेंगे। साथ ही, इस प्रकार के बयानों से समानता, भाईचारा, धर्मनिरपेक्षता और मानव गरिमा जैसे संवैधानिक मूल्यों को नुकसान पहुंचता है और इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत सुरक्षा नहीं दी जा सकती।
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