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पॉक्सो मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पीड़िता से शादी के बाद दोषी बरी, अनुच्छेद 142 का किया इस्तेमाल

Mon, 08 Jun 2026 09:01 PM IST
Devesh Tripathi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए पॉक्सो कानून में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा और दोषसिद्धि रद्द कर दी। अदालत ने यह फैसला इस आधार पर दिया कि पीड़िता और आरोपी अब बालिग हैं, आपसी सहमति से विवाह कर चुके हैं तथा उनके बीच समझौता हो गया है। पीड़िता ने अदालत को बताया कि वह मुकदमे को आगे नहीं बढ़ाना चाहती।
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पॉक्सो मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। अदालत ने यह फैसला इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए दिया कि दोनों पक्ष बालिग होने के बाद विवाह कर चुके हैं और उनके बीच समझौता हो गया है।
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न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने तमिलनाडु एक शख्स की अपील स्वीकार करते हुए पॉक्सो अधिनियम की धारा 5(1) के साथ धारा 6 के तहत हुई उसकी दोषसिद्धि को रद्द कर दिया और उसे आरोपों से बरी कर दिया। हालांकि, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राहत मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए दी गई है और इसे किसी अन्य मामले में नजीर के तौर पर नहीं माना जाएगा।

संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली शक्तियों का किया इस्तेमाल
न्यायमूर्ति माहेश्वरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, "इस स्तर पर मामले के गुण-दोष में जाए बिना, ऊपर वर्णित विशेष परिस्थितियों को देखते हुए हम संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी पूर्ण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अपीलकर्ता की दोषसिद्धि और सजा को रद्द करना उचित समझते हैं।"
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क्या है पूरा मामला?
मामला पीड़िता की शिकायत से जुड़ा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि आरोपी ने नाबालिग होने के दौरान उससे शादी का वादा कर कई बार संबंध बनाए। सुनवाई के बाद धर्मपुरी की फास्ट ट्रैक महिला अदालत ने अप्रैल 2019 में शख्स को दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी।

मद्रास हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान पीड़िता ने अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने की अनुमति मांगी थी। उसने कहा था कि उसके और आरोपी के बीच विवाद सुलझ गया है और दोनों साथ रहना चाहते हैं। मद्रास हाईकोर्ट ने यह अनुरोध खारिज कर दिया, जिसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

बयान से पलटी पीड़िता, कही समझौता होने का बात
इसके बाद शीर्ष अदालत ने पीड़िता का बयान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराने का निर्देश दिया। दिसंबर 2022 में दर्ज बयान में पीड़िता ने कहा था कि आरोपी ने उसके नाबालिग रहने के दौरान उससे संबंध बनाए थे और जब उसने विवाह से इनकार किया तो उसने शिकायत दर्ज कराई थी।

हालांकि, फरवरी 2025 में दर्ज बाद के बयान में उसने बताया कि किसी अन्य व्यक्ति से उसका विवाह सफल नहीं रहा। इसके बाद उसने पांच दिसंबर 2024 को अपीलकर्ता से विवाह कर लिया और अब उसके साथ रह रही है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आरोपी ने पीड़िता के भविष्य और पारिवारिक जीवन को सुरक्षित करने के लिए उसे 10 लाख रुपये का भुगतान किया।

दोषी शख्स ने पीड़िता के खाते में जमा कराए 10 लाख रुपये
पीड़िता ने अदालत को बताया कि उसे पूरी राशि मिल गई है और वह अब मुकदमे को आगे नहीं बढ़ाना चाहती है। पीठ ने अपने आदेश में दर्ज किया, "पीड़िता ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि उसे 10 लाख रुपये की राशि प्राप्त हो चुकी है और वह इस मुकदमे को समाप्त करना चाहती है। उसने यह भी स्पष्ट कहा है कि यदि अपीलकर्ता की दोषसिद्धि रद्द कर दी जाती है तो उसे कोई आपत्ति नहीं है।"

तमिलनाडु सरकार ने भी अदालत को बताया कि मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए उसे दोषसिद्धि रद्द किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि, उसने अनुरोध किया कि इस आदेश को नजीर न माना जाए। पीड़िता के बयानों, दोनों के बालिग होने के बाद हुए विवाह और आरोपी द्वारा दिए गए मुआवजे को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा- ये फैसला नजीर नहीं
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया, "हम स्पष्ट करते हैं कि यह आदेश मामले के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों में पारित किया गया है। इसलिए इसे किसी अन्य उद्देश्य के लिए नजीर के रूप में नहीं माना जाएगा।" मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने 2019 में ही अपीलकर्ता की सजा पर रोक लगा दी थी। इसके चलते शीर्ष अदालत ने कहा कि उसे आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं है और उसके जमानत बांड भी समाप्त किए जाते हैं।

पॉक्सो दोषियों को पहले भी बरी कर चुका है सुप्रीम कोर्ट
पश्चिम बंगाल में हुए ऐसे ही एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए दोषी को बरी कर दिया था। इस मामले में पीड़िता की मुलाकात आरोपी से 2017 में उसकी पड़ोसी के माध्यम से हुई, जो आरोपी की बहन भी थी। उस समय पीड़िता 13 वर्ष की थी और आरोपी 25 वर्ष का था। समय के साथ, उनके बीच संबंध विकसित हुए और 2018 को पीड़िता ने अपना घर छोड़ दिया और एक मंदिर में आरोपी से शादी कर ली। नौ दिनों के भीतर, उसकी मां ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पीड़िता को एक महीने के लिए आश्रय गृह में रखा गया और फिर उसके माता-पिता के पास वापस भेज दिया गया। उसने अपनी शिक्षा फिर से शुरू की और कक्षा 10 में पदोन्नत हो गई।

हालांकि, इसी दौरान पीड़िता ने फिर से अपना मायका छोड़ दिया और आरोपी के साथ रहने लगी। मई 2021 में उसने एक बेटी को जन्म दिया। प्रसव के बाद कुछ समय अपने माता-पिता के साथ रहने के बाद वह आरोपी के परिवार के घर लौट आई। जब बच्ची सात महीने की थी, तब आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया था।
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