सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को मामलों को हल्के में लेने के लिए फटकार लगाई और देश भर में रहने वाले पूर्वोत्तर क्षेत्र के लोगों के साथ जारी भेदभाव पर चिंता व्यक्त की। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने केंद्र सरकार से पूर्वोत्तर के लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए अदालत की गठित निगरानी समिति की हर तीन महीने में बैठक न बुलाने पर सवाल उठाया। पीठ ने कहा, हम इस मामले को बंद नहीं करने जा रहे हैं। हमारी ओर से इस मामले को लंबित रखने के बावजूद, आप (केंद्र) इसे बहुत हल्के में ले रहे थे।
15 दिसंबर के बाद, आपने तब तक कोई बैठक नहीं की जब तक हमने आपको बैठक करने के लिए नहीं कहा। केंद्र सरकार को हर तीन महीने में बैठक करनी थी। पीठ ने कहा कि 17 फरवरी के अपने आदेश के अनुसार, समिति की बैठक 15 मार्च को हुई थी, हालांकि, अगली प्रस्तावित बैठक की तारीख का उल्लेख नहीं है। मामले को स्थगित करते हुए, पीठ ने समिति को 15 मार्च की बैठक में चर्चा किए गए मुद्दों को आगे बढ़ाने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई 15 जुलाई को तय की।
पीठ ने पूर्वोत्तर के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव के प्रति अधिक संवेदनशीलता बरतने का भी आह्वान किया। जस्टिस कुमार ने कहा, व्हाट्सएप पर एक वीडियो वायरल हो रहा है। मैं मणिपुर में था और वहां मेरे कई दोस्त हैं... वीडियो में बज रहे गाने में कहा गया है, हमें नेपाली कहो, हमें चिनकी कहो, लेकिन हम फिर भी भारतीय हैं। शीर्ष अदालत देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले पूर्वोत्तर भारत के लोगों के कल्याण से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इससे पहले, अदालत ने निगरानी समिति को नस्लीय भेदभाव की घटनाओं पर ध्यान देने और हर तीन महीने में बैठक करने का निर्देश दिया था।
अनुकूल न्यायिक आदेश के लिए रिश्वत मांगने वाले वकील की याचिका खारिज
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के मामले में अनुकूल न्यायिक आदेश दिलाने के लिए 30 लाख रुपये की रिश्वत मांगने के आरोप में गिरफ्तार वकील की जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि वह न्यायपालिका को बेच रहा है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, आपने (याचिकाकर्ता) एक जज को खुले बाजार में बेचने की कोशिश की। पीठ की ओर से याचिका पर विचार करने से इन्कार करने के बाद, याचिकाकर्ता के वकील ने इसे वापस ले लिया।
याचिका में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फरवरी के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता को जमानत देने से इन्कार कर दिया गया था। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि उसे अगस्त 2025 में गिरफ्तार किया गया था और वह पिछले आठ महीनों से हिरासत में है। वकील ने तर्क दिया कि मामले में अभी तक आरोप तय नहीं किए गए हैं। पीठ ने कहा, वह न्यायपालिका को बेच रहा है... हमें ऐसे लोगों के लिए कोई सहानुभूति नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने अलग रह रहे पति-पत्नी के बीच एक दशक से चले आ रहे वैवाहिक विवाद को महाभारत का युद्ध करार देते हुए कानूनी जंग को पूरी तरह से खत्म कर दिया और उनकी शादी को रद्द करते हुए 80 से अधिक मामलों को खारिज कर दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए शादी को भंग कर दिया क्योंकि पीठ ने पाया कि दंपती की शादी व्यावहारिक रूप से खत्म हो चुकी है। अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को किसी भी मामले में पूर्ण न्याय करने के लिए कोई भी आदेश पारित करने का अधिकार देता है।
पीठ ने वकील पति की इस बात के लिए आलोचना की कि उसने अपने पेशे का इस्तेमाल करते हुए पत्नी, उसके परिवार और यहां तक पत्नी के वकील के खिलाफ 80 से अधिक कानूनी मामले दर्ज कराए जोकि बदले की भावना और परेशान करने वाले थे।
कई मामले दर्ज कराना पति की शत्रुतापूर्ण रवैये का संकेत
मंगलवार को सुनाए गए फैसले में जस्टिस मेहता ने लिखा कि अलग हो चुके और आपस में कड़वाहट रखने वाले पति-पत्नी एक लंबे और कड़वे वैवाहिक झगड़े में उलझे हुए थे। इसके चलते अलग-अलग अदालतों और मंचों पर कई मुकदमे दायर किए गए। हमने पाया कि प्रतिवादी पति ने हर स्तर पर, न केवल अपीलकर्ता पत्नी और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ, बल्कि उसके वकीलों के खिलाफ भी अनगिनत आवेदन और शिकायतें दायर कर कार्यवाही को बढ़ाने और जटिल बनाने की कोशिश की है। इनमें से अधिकतर कार्यवाही प्रतिशोधात्मक और परेशान करने वाली प्रतीत होती है।
फैसले में कहा गया कि यह स्पष्ट रूप से प्रतिवादी पति की ओर से एक शत्रुतापूर्ण, झगड़ालू और प्रतिशोधी रवैये का संकेत देता है। पीठ ने कहा कि वह उस कारण का अंदाजा लगा सकती है, जिसके चलते महिला को अपना वैवाहिक संबंध जारी रखना बेहद मुश्किल लगा होगा।