सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र और गोवा बार काउंसिल (बीसीएमजी) पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। दरअसल बीसीएमजी ने एक वकील के खिलाफ झूठी शिकायत को दर्ज कर अनुशासन समिति को भेज दिया था। अदालत ने कहा कि किसी हलफनामे पर वकील मात्र सत्यापन करने से उसके अंदर लिखी गई बातों का पक्षकार नहीं हो जाता। अनुशासनात्मक कार्यवाही जैसी गंभीर प्रक्रिया को तुच्छ और दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के आधार पर शुरू करना न केवल न्याय के खिलाफ है बल्कि पेशेवर स्वतंत्रता को भी प्रभावित करता है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश उस याचिका पर सुनाया, जिसे बार काउंसिल ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दाखिल किया था। हाईकोर्ट ने संबंधित वकील के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का आदेश सही था और इसमें किसी प्रकार की कानूनी कमी नहीं थी।
अदालत ने कहा कि शिकायत दर्ज कराने वाले व्यक्ति और उसके बाद बार काउंसिल ने मिलकर संबंधित वकील को बेहद परेशान और प्रताड़ित किया। यह मामला दरअसल 1985 के एक सिविल मुकदमे से जुड़ा है, जिसमें वकील ने वादी की ओर से पैरवी की थी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि समझौते की शर्तों में गड़बड़ी हुई और वकील इसमें शामिल थे। साथ ही यह भी कहा गया कि वकील कथित धोखाधड़ी के सीधे लाभार्थी थे।
जुर्माना राशि चार हफ्तों के भीतर बॉम्बे हाईकोर्ट में जमा करनी होगी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बार काउंसिल का आदेश न केवल अवैध था बल्कि विकृत मानसिकता को दिखाता था। अदालत ने इसे प्रतिद्वंद्वी पक्ष की ओर से की गई दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई बताया। पीठ ने आदेश दिया कि शिकायतकर्ता बंसीधर अन्नाजी भाखड़ और बार काउंसिल दोनों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाए। यह रकम चार हफ्तों के भीतर बॉम्बे हाई कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा करनी होगी, जहां से इसे संबंधित वकील को दिया जाएगा।