फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

I-PAC छापेमारी विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आचरण ने लोकतंत्र को खतरे में डाला

Wed, 22 Apr 2026 04:43 PM IST
Riya Dubey न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री का जांच में दखल देना केंद्र बनाम राज्य का नहीं बल्कि कानून के उल्लंघन का मामला है। अदालत ने ईडी अधिकारियों के खिलाफ राज्य की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए सीसीटीवी साक्ष्य सुरक्षित रखने के आदेश दिए हैं।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी - फोटो : @अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के बीच जारी कानूनी जंग में बड़ी टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि कोई मुख्यमंत्री व्यक्तिगत रूप से केंद्रीय एजेंसी की जांच प्रक्रिया में प्रवेश करता है या उसमें बाधा डालता है, तो इसे केवल केंद्र बनाम राज्य का राजनीतिक विवाद मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। न्यायालय के अनुसार, यह सीधे तौर पर कानून के शासन और संवैधानिक मर्यादा से जुड़ा विषय है। अदालत ने कहा कि ममता बनर्जी के इस आचरण ने लोकतंत्र को खतरे में डाला है। 

विज्ञापन


यह मामला जनवरी 2026 में कोयला घोटाले की जांच के दौरान आई-पैक के कार्यालय और उसके निदेशक प्रतीक जैन के आवास पर हुई छापेमारी से जुड़ा है। ईडी ने आरोप लगाया था कि छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद हस्तक्षेप किया था। वहीं, एजेंसी ने ममता बनर्जी की ओर से की गई इस कार्रवाई को अपनी वैधानिक ड्यूटी में बड़ी बाधा माना है।

अदालत ने क्या-क्या कहा? 
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्र की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के रुख पर कड़े सवाल उठाए। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति किसी सक्रिय तलाशी अभियान वाली जगह पर चला आता है, तो यह जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जस्टिस मिश्र ने पश्चिम बंगाल सरकार के अधिवक्ता से पूछा, 'क्या ईडी के अधिकारियों से यह उम्मीद की जाती है कि जब मुख्यमंत्री खुद छापेमारी वाली जगह पर घुस आएं और कार्रवाई को बाधित करें, तो वे मूकदर्शक बनकर खड़े रहें?'
विज्ञापन


सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने कहा कि यह विवाद केवल केंद्र और राज्य के बीच का नहीं है, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया कृत्य है जो मुख्यमंत्री जैसे उच्च संवैधानिक पद पर बैठकर पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती दे रहा है। राज्य सरकार की ओर से तकनीकी आधार पर अनुच्छेद 32 की वैधता पर उठाए गए सवालों का जवाब देते हुए जस्टिस कुमार ने कहा कि केशवानंद भारती केस से लेकर सीरवाई जैसे महान संविधानविदों ने भी कभी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की होगी कि भारत में एक दिन ऐसा भी आएगा जब कोई मौजूदा मुख्यमंत्री स्वयं किसी जांच एजेंसी के दफ्तर में घुसकर उसकी वैधानिक प्रक्रिया में इस प्रकार हस्तक्षेप करेगा।

अनुच्छेद 32 और मौलिक अधिकारों पर बहस
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने दलील दी कि ईडी एक सरकारी विभाग है, कोई व्यक्ति नहीं, इसलिए वह अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर नहीं कर सकता। इस पर शीर्ष अदालत ने कहा कि ईडी के अधिकारी व्यक्तिगत रूप से भी भारत के नागरिक हैं। यदि उन्हें डराया-धमकाया जाता है या उनकी ड्यूटी करने से रोका जाता है, तो उनके मौलिक अधिकारों का हनन होता है।

अदालत ने एक काल्पनिक स्थिति का उदाहरण भी दिया। सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी के वकील से पूछा कि यदि केंद्र में उनकी सरकार होती और किसी अन्य राज्य का मुख्यमंत्री इसी तरह केंद्रीय एजेंसी की जांच में बाधा डालता, तो उनकी कानूनी प्रतिक्रिया क्या होती?

यह भी पढ़ें: Assembly Elections: 'घुसपैठ मुक्त बंगाल बनाना लक्ष्य, कांग्रेस नहीं खोल पाएगी खाता'; रैली में शाह की हुंकार

क्या है पूरा मामला? 
प्रवर्तन निदेशालय का दावा है कि आठ जनवरी 2026 को छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ मौके पर पहुंची थीं। आरोप है कि वहां से जबरन महत्वपूर्ण फाइलें, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और यहां तक कि एक अधिकारी का मोबाइल फोन भी छीन लिया गया। एजेंसी ने इसे अधिकारियों का मनोबल गिराने वाली कार्रवाई बताया। दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल सरकार का कहना है कि ईडी का इस्तेमाल चुनाव के समय तृणमूल कांग्रेस की रणनीतिक जानकारी जुटाने के लिए किया जा रहा है। राज्य पुलिस ने तर्क दिया कि उन्हें परिसर में हथियारबंद लोगों के घुसने की सूचना मिली थी, जिसके बाद सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए गए।
विज्ञापन


सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल पुलिस की ओर से ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज की गई तीन एफआईआर पर रोक लगा दी है। साथ ही, राज्य सरकार को उस दिन की पूरी सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि इस तरह के हस्तक्षेप को अनुमति दी गई, तो देश में अराजकता की स्थिति पैदा हो जाएगी और कोई भी प्रभावी जांच संभव नहीं होगी।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें