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Supreme Court: विशेष ट्रायल कोर्ट से न्यायपालिका की कितनी मदद? CJI सूर्यकांत की पीठ ने कही यह बात, जानिए मामला

Wed, 21 Jan 2026 02:17 PM IST
अस्मिता त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अतिरिक्त ट्रायल और विशेष अदालतों की स्थापना से न्यायिक प्रणाली मजबूत होगी। वहींं,आरोपियों को जमानत या त्वरित सुनवाई के लिए बार-बार सर्वोच्च न्यायालय आने की जरूरत नहीं पड़ेगी। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि अतिरिक्त ट्रायल कोर्ट की स्थापना से न्यायिक प्रणाली मजबूत बनेगी। आपराधिक मामलों में आरोपियों को जमानत या त्वरित सुनवाई जैसी राहत के लिए सर्वोच्च न्यायालय में आने की आवश्यकता नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट ने 6 जनवरी को केंद्र और दिल्ली सरकार से एक व्यक्ति के आईएसआईएस से संबंधों से संबंधित राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा जांच किए जा रहे 2021 के मामले में दिन-प्रतिदिन सुनवाई करने के लिए एक विशेष अदालत स्थापित करने पर विचार करने को कहा था।

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 किसी को भी अदालतों में आने की आवश्यकता न पड़े- मुख्य न्यायाधीश
बुधवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से राष्ट्रीय राजधानी में एक विशेष अदालत की स्थापना में हुई प्रगति के बारे में पूछा। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "विचार यह है कि एक ऐसा मजबूत तंत्र कैसे बनाया जाए जिससे उनमें से किसी को भी अदालतों में आने की आवश्यकता न पड़े? और ऐसा तभी होगा जब अतिरिक्त अदालतें स्थापित की जाएंगी।"पीठ ने विधि अधिकारी से 10 फरवरी तक यहां विशेष न्यायालय की स्थापना की दिशा में हुई प्रगति की जानकारी देने को कहा। अब इस मामले पर उसी दिन सुनवाई होगी।

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क्या है मामला 
पीठ मोहम्मद हेयदाइतुल्लाह की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिस पर आरोप है कि उसने भारत में आतंकवादी समूह की विचारधारा का प्रचार करने और अन्य व्यक्तियों की भर्ती करने के लिए टेलीग्राम समूहों का इस्तेमाल किया। इससे पहले मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि मुकदमे में अत्यधिक देरी से आरोपी की ओर से यह वैध दलील दी जा सकती है कि उसे लंबे समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता, वह भी बिना मुकदमे के। पीठ ने भाटी से एक सप्ताह के भीतर उस विशेष अदालत की स्थापना के बारे में जानकारी देने को कहा था, जो यहां उस मामले की दिन-प्रतिदिन सुनवाई करने के लिए स्थापित की गई है, जिसमें 125 गवाहों से पूछताछ की जानी है। आईएसआईएस से जुड़े एक मामले में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने आतंकी संगठन के कथित सदस्य हेयदाइतुल्लाह को साइबरस्पेस का उपयोग करके युवाओं के कट्टरपंथीकरण से संबंधित मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया था।
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उच्च न्यायालय ने इस दलील खारिज की थी
अभियुक्त ने इस आधार पर किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार करने वाले निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी थी कि किसी आतंकवादी संगठन से मात्र संबंध रखना या उसका समर्थन करना गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत अपराध नहीं होगा। उच्च न्यायालय ने इस दलील को खारिज कर दिया था और कहा था कि गुरुग्राम की एक आईटी कंपनी में काम करने वाले योग्य एमबीए स्नातक हेयदाइतुल्लाह निष्क्रिय समर्थक नहीं थे, क्योंकि सबूतों से पता चलता है कि उन्होंने हिंसक साधनों के माध्यम से भी "खिलाफत स्थापित करने के लिए जिहाद" की वकालत की थी। उच्च न्यायालय ने कहा था, “अपीलकर्ता ने स्वीकार किया है कि उसने 2018 में अबू बक्र अल बगदादी और अबू अल-हसन अल-हाशिमी अल-कुरैशी के नाम पर शपथ (बयात) ली थी। अबू बक्र अल बगदादी आईएसआईएस का एक जाना-माना नेता है और आरोप पत्र के अनुसार उसने जून 2014 में 'खिलाफत' की स्थापना की घोषणा की थी।”


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