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Supreme Court: विजय शाह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा- मुकदमा चलाने की मंजूरी देनी है या नहीं

Mon, 19 Jan 2026 07:11 PM IST
शिवम गर्ग न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह दो हफ्ते के अंदर राज्य मंत्री विजय शाह पर मुकदमा चलाने की मंजूरी देने पर फैसला करे। शाह पर ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के बारे में कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणी करने का आरोप है।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि मंत्री विजय शाह के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी पर दो हफ्ते के भीतर फैसला करे। यह मामला कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ उनके आपत्तिजनक बयानों से जुड़ा है। कोर्ट ने कहा कि विशेष जांच टीम ने अपनी जांच पूरी कर ली है और अंतिम रिपोर्ट जमा कर दी है। अब राज्य सरकार की मंजूरी का इंतजार है, जो भारतीय दंड संहिता की धारा 196 (साम्प्रदायिक नफरत फैलाना) के तहत कार्रवाई के लिए जरूरी है। एसआईटी ने शाह के अन्य कथित आपत्तिजनक बयानों का भी हवाला दिया है और कोर्ट ने इसके लिए भी रिपोर्ट मांगी है।

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सुप्रीम कोर्ट में शाह के वरिष्ठ वकील ने कहा कि शाह ने अपनी माफी दर्ज कराई है और जांच में सहयोग कर रहे हैं। हालांकि, कोर्ट ने माफी को रिकॉर्ड पर स्वीकार नहीं किया और कहा कि यह बहुत देर से दी गई है। इससे पहले, कोर्ट ने उनकी सार्वजनिक माफी को 'घड़ियाली आंसू' बताते हुए इसे कानूनी जिम्मेदारी से बचने का तरीका माना था। 

गौरतलब है कि यह मामला 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद उठकर सामने आया, जब शाह ने कर्नल कुरैशी के खिलाफ विवादित बयान दिए। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए FIR दर्ज करने का आदेश दिया। इसके बाद शाह ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने उनके बयानों की निंदा करते हुए SIT जांच के आदेश दिए और फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी।

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त्योहारों में हवाई किराए पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र और डीजीसीए से जवाब तलब
सुप्रीम कोर्ट ने त्योहारों और विशेष आयोजनों के दौरान हवाई किराए में बेतहाशा बढ़ोतरी पर कड़ी चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि एयरलाइंस द्वारा किरायों में होने वाला अचानक और अनियंत्रित उतार-चढ़ाव यात्रियों के शोषण जैसा है। प्रयागराज, जोधपुर जैसे शहरों के लिए त्योहारों के समय किराए में भारी उछाल का हवाला देते हुए कोर्ट ने साफ कहा कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और डीजीसीए को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें हवाई किरायों और अतिरिक्त शुल्कों पर सख्त नियामक दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है। याचिका में आरोप है कि एयरलाइंस मनमाने ढंग से किराया बढ़ा रही हैं और मुफ्त चेक-इन बैगेज घटाकर यात्रियों पर अतिरिक्त बोझ डाल रही हैं। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की व्यवस्था गरीब और मजबूर यात्रियों के अधिकारों का उल्लंघन करती है। अगली सुनवाई 23 फरवरी को होगी।

कस्टडी विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को रूसी महिला और उसके बच्चे का पता लगाने के लिए चार हफ्ते का समय दिया
सुप्रीम कोर्ट ने कस्टडी विवाद के बीच अपने बच्चे को लेकर मॉस्को भाग गई रूसी महिला व उसके बच्चे का पता लगाने के लिए केंद्र को चार सप्ताह का समय दिया। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी की दलीलों पर गौर किया कि महिला और बच्चे का पता लगाने के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। भाटी ने कहा कि उन्हें ढूंढ़कर भारत वापस लाने के लिए इंटरपोल को नोटिस भी जारी किए गए हैं। हमें कुछ नई जानकारी मिल रही है... कृपया हमें कुछ और सप्ताह का समय दें। हम एक अपडेट रिपोर्ट दाखिल करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि रूस एक सदाबहार मित्र है। पीठ ने सहमति जताते हुए केंद्र को चार सप्ताह का समय दिया। इससे पहले विदेश मंत्रालय सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट दाखिल करता था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केवल अपमानजनक या गाली गलौज वाली भाषा का इस्तेमाल अपने आप में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस कानून के तहत अपराध के दायरे में आने के लिए यह साबित होना चाहिए कि वह कृत्य किसी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने के विशेष इरादे से किया गया हो।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि केवल यह तथ्य कि पीड़ित अनुसूचित जाति या जनजाति से संबंधित है, यह पर्याप्त नहीं है। पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए एक अपीलकर्ता के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने पाया कि न तो प्राथमिकी और न ही आरोपपत्र में यह आरोप था कि अपीलकर्ता ने किसी जाति आधारित अपमान या धमकी का कृत्य किया। शीर्ष अदालत पटना हाईकोर्ट के 15 फरवरी 2025 के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के समन आदेश में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया था। आरोप था कि आंगनवाड़ी केंद्र में हुई एक घटना के दौरान शिकायतकर्ता (अनुसूचित जाति) के साथ जातिसूचक गालियां दी गईं और मारपीट की गई।

शीर्ष कोर्ट ने पाया, आरोप अस्पष्ट और सामान्य
अपीलकर्ता पर भारतीय दंड संहिता की धाराएं 341, 323, 504, 506, 34 तथा एससी/एसटी कानून की धारा 3(1)(आर) और 3(1)(एस) के तहत आरोप लगाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आरोप अस्पष्ट और सामान्य हैं और किसी विशेष आपराधिक कृत्य का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। अदालत ने धारा 3(1)(आर) की व्याख्या करते हुए कहा कि इस अपराध के लिए दो शर्तें अनिवार्य हैं। पहली, शिकायतकर्ता का अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य होना और दूसरी, अपमान या धमकी केवल उसकी जातिगत पहचान के कारण दी गई हो।

जाति के नाम से गाली देना स्पष्ट होना चाहिए
इसी तरह धारा 3(1)(एस) के संदर्भ में अदालत ने कहा कि आरोपों में यह स्पष्ट होना चाहिए कि जाति के नाम से सार्वजनिक रूप से गाली दी गई और वह गाली जाति को नीचा दिखाने के इरादे से दी गई हो। इन तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्राथमिकी और आरोपपत्र में ऐसा कोई संकेत नहीं है जिससे यह साबित हो कि अपीलकर्ता का कृत्य जाति आधारित अपमान से प्रेरित था। लिहाजा शीर्ष  अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली और अपीलकर्ता के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया।

मानसिक रूप से बीमार बेघर लोग सबसे अधिक असुरक्षित, केंद्र पुनर्वास की एसओपी तैयार करे
सुप्रीम कोर्ट ने मानसिक बीमारियों से पीड़ित बेघर लोगों को सबसे अधिक असुरक्षित बताते हुए केंद्र को उनके पुनर्वास के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) तैयार करने का अंतिम अवसर दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने केंद्र के वकील की ओर से याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगने के बाद, जनहित याचिका की सुनवाई 9 फरवरी तक स्थगित कर दी। पीठ ने केंद्र की ओर से अदालत में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नचिकेत जोशी से कहा, हम आपको एसओपी तैयार करने और जवाब दाखिल करने का अंतिम अवसर दे रहे हैं। यह एक संवेदनशील मुद्दा है और सब कुछ एसओपी के प्रभावी कार्यान्वयन पर निर्भर करता है। ये लोग अत्यंत निर्धन और सबसे अधिक असुरक्षित हैं। कृपया अगली सुनवाई की तारीख पर एसओपी का मसौदा दाखिल करें।
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न्यायिक सुधारों से संबंधित जनहित याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने इसे सिर्फ प्रचार हित करार दिया
न्यायिक सुधारों की मांग वाली एक जनहित याचिका पर कड़ा संज्ञान लेते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने इसे प्रचार हित याचिका करार दिया और याचिका खारिज कर दी। शीर्ष अदालत ने कहा, अदालत को बाहर लगे कैमरों के सामने अपनी बात रखने का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने यह आदेश देने की मांग की थी कि देश की प्रत्येक अदालत को एक वर्ष के भीतर किसी भी मामले का फैसला करना होगा। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सवाल उठाया कि वे सभी मामलों का फैसला एक वर्ष के भीतर करने का निर्देश कैसे जारी कर सकते हैं। यह जनहित याचिका कमलेश त्रिपाठी ने दायर की थी, जो स्वयं अदालत में पेश हुए और अपनी दलीलें पेश कीं।

सुनवाई के दौरान त्रिपाठी ने अपने मामले पर हिंदी में बहस करने का अनुरोध किया। देश में बदलाव लाने की उनकी याचिका पर प्रतिक्रिया देते हुए सीजेआई ने कहा कि औपचारिक याचिका ऐसी आकांक्षाओं के लिए उपयुक्त माध्यम नहीं है। सीजेआई ने कहा, आप देश में बदलाव चाहते हैं? आपको ऐसी याचिका डालने की जरूरत नहीं है, आप एक पत्र लिख कर मुझे भेज दीजिए। पीठ ने प्रचार हित संबंधी मुकदमों को दायर करने के पीछे के मकसद की विशेष रूप से आलोचना की। सीजेआई ने कहा, आप लोग सिर्फ जो बाहर कैमरामैन खड़े हैं उनके सामने बोलने के लिए याचिका मत डालिये (सिर्फ इसलिए याचिका दायर न करें ताकि आप बाहर कैमरों के सामने बोल सकें)।
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