इससे पहले शीर्ष अदालत ने 2020 में केंद्र को नोटिस जारी कर 2019 में दायर याचिका पर स्वास्थ्य और पर्यावरण मंत्रालयों से जवाब मांगा था। याचिका में, एनजीओ ने मांग की हे कि रेबीज रोगियों के लिए एक प्रक्रिया निर्धारित की जानी चाहिए ताकि उन्हें या उनके अभिभावकों को सहायक मृत्यु या निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए चिकित्सकों की सहायता लेने का विकल्प चुनने की अनुमति मिल सके।
सुप्रीम कोर्ट रेबीज पीड़ित व्यक्तियों के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु के अधिकार की मांग वाली जनहित याचिका पर अब दो हफ्ते बाद सुनवाई करेगा। एनजीओ ऑल क्रिएचर्स ग्रेट एंड स्मॉल की याचिका सोमवार को जस्टिस बीआर गवई व जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आई। पीठ ने इसे दो हफ्ते के लिए स्थगित कर दिया। पीठ के समक्ष सोमवार को याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि केंद्र ने 2018 में इस मामले में हाईकोर्ट में जवाबी हलफनामा दाखिल किया था। पीठ ने कहा, हम दो सप्ताह बाद किसी गैर-विविध दिन इस पर सुनवाई करेंगे।
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कोर्ट ने स्वास्थ्य और पर्यावरण मंत्रालयों से जवाब मांगा है
इससे पहले शीर्ष अदालत ने 2020 में केंद्र को नोटिस जारी कर 2019 में दायर याचिका पर स्वास्थ्य और पर्यावरण मंत्रालयों से जवाब मांगा था। याचिका में, एनजीओ ने मांग की हे कि रेबीज रोगियों के लिए एक प्रक्रिया निर्धारित की जानी चाहिए ताकि उन्हें या उनके अभिभावकों को सहायक मृत्यु या निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए चिकित्सकों की सहायता लेने का विकल्प चुनने की अनुमति मिल सके।
सुप्रीम कोर्ट ने पांच साल पहले निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैधानिक बनाया था
9 मार्च, 2018 को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा था कि जीवन के अधिकार में मरने का अधिकार भी शामिल है और ‘लिविंग विल’ बनाने की अनुमति देकर निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैधानिक बना दिया था। इसके तहत असाध्य रूप से बीमार या स्थायी रूप से निष्क्रिय अवस्था (पीवीएस) में पड़े उन रोगियों को चिकित्सा उपचार या जीवन रक्षक प्रणाली से इन्कार करके सम्मानजनक तरीके से विदा लेने का अवसर दिया जा सकता है, जिनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है।