NHRC में खाली पदों को भरने के निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को जारी किया नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) में खाली तीन पदों को भरने के लिए निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर मंगलवार को केंद्र से जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ ने सरकार को तीन सप्ताह के भीतर जवाब देने योग्य नोटिस जारी किया है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि मौजूदा सीटें 11 सितंबर, 2021, 4 जनवरी, 2023 और 4 अप्रैल, 2022 को खाली हो गईं। शीर्ष अदालत वकील राधाकांत त्रिपाठी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें एनएचआरसी में रिक्त पदों को भरने के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी।
पीठ ने कहा कि एनएचआरसी में तीन सदस्यों की नियुक्ति में सरकार की विफलता आयोग के कामकाज को प्रभावित कर रही है। इसका सीधा असर कानून के शासन और न्याय प्रशासन पर पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट में कल होगी याचिका पर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में तीस्ता सीतलवाड़ की उस अर्जी पर बुधवार को सुनवाई होगी। जिसमें गुजरात हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई है। गुजरात हाई कोर्ट ने शनिवार को तीस्ता को तत्काल आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था। इसके बाद उसी दिन देर रात में सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ ने मामले की सुनवाई कर तीस्ता को राहत प्रदान की थी।
एम3एम मनी लॉन्ड्रिंग मामला: ईडी की कठोर शक्तियों पर लगाम की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत गुरुग्राम स्थित रियल्टी समूह एम3एम से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई की गई। इस मामले में न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश की पीठ सुनवाई कर रही थी। इस दौरान रियल्टी समूह एम3एम के निदेशकों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने शीर्ष कोर्ट से केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय की शक्तियों पर लगाम लगाने की मांग की। उन्होंने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को मनी लॉन्ड्रिंग मामलों की जांच के लिए कड़ी शक्तियां दी गई हैं। इन शक्तियों पर लगाम लगाने की जरूरत है।
वकील हरीश साल्वे ने कहा कि ईडी को दी गई कठोर शक्तियां पर अगर अदालत लगाम नहीं लगाती है, तो इस देश में कोई भी सुरक्षित नहीं है। इस दौरान उन्होंने कंपनी के निदेशकों की गिरफ्तारी के तरीके पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल धन शोधन मामले की जांच में सहयोग कर रहे थे। उसके बाद भी उनकी गिरफ्तारी की गईय़ यह उनके अधिकारों का उल्लंघन है। इन शक्तियों पर लगाम लगाने की जरूरत है।
इस मामले में सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद पीठ ने अपना आदेश सुनाया। पीठ ने बंसल बंधुओं को अग्रिम जमानत के लिए पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट जाने के लिए कहा। जहां उनकी याचिकाओं का निपटारा कर दिया।
साल्वे और वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी एम3एम के निदेशकों बसंत बंसल और पंकज बंसल का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। दोनों को एक पूर्व न्यायाधीश के खिलाफ रिश्वत मामले से संबंधित मनी-लॉन्ड्रिंग जांच में गिरफ्तार किया गया था। बंसल बंधुओं को ईडी ने 14 जून को धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत गिरफ्तार किया था। बाद में उन्हें हरियाणा के पंचकुला में एक विशेष पीएमएलए अदालत के समक्ष पेश किया गया, जिसने उन्हें पांच दिन की ईडी हिरासत में भेज दिया।
जमानत के लिए धोखाधड़ी की रकम जमा करने का वचन देने वाले आरोपियों पर शीर्ष कोर्ट ने की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए आरोपियों की एक परेशान करने वाली प्रवृत्ति पर ध्यान आकृष्ट कराया है। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि कई बार धोखाधड़ी के आरोपी जमानत पाने के लिए अपने पीड़ितों से ठगी गई रकम को जमा करने का वचन देते हैं। शीर्ष कोर्ट ने अदालतों से कहा कि ऐसे आवेदनों या याचिकाओं से प्रभावित होने की जरूरत नहीं है।
न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने संपत्ति विवाद से संबंधित एक धोखाधड़ी के मामले में सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि बीते कई महीनों में कई मामलों में हमने पाया है कि कथित तौर पर धोखाधड़ी की गई धनराशि की वसूली के लिए प्रक्रियाओं में तब्दील किया जा रहा है। अदालतों को गिरफ्तारी पूर्व जमानत देने के लिए पूर्व-आवश्यकता के रूप में जमा/भुगतान की शर्तें लगाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
गौरतलब है कि शीर्ष कोर्ट ने इस मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया। इसमें दिल्ली हाई कोर्ट ने संपत्ति विवाद से संबंधित एक मामले में धोखाधड़ी के आरोपी एक व्यक्ति को इस शर्त पर जमानत दी थी कि वह 22 लाख रुपये जमा करेगा। कथित तौर पर उसने धोखाधड़ी की थी।
धर्मांतरण रैकेट में अब्दुल्ला उमर को सुप्रीम कोर्ट से सशर्त जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने अवैध धर्मांतरण रैकेट से जुड़े एक मामले में आरोपी अब्दुल्ला उमर को जमानत दे दी। जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने मंगलवार को अब्दुल्ला उमर को यह कहते हुए जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया कि उसे आगे हिरासत में रखने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि इस मामले में आरोप तय हो चुके हैं। हालांकि, पीठ ने उसके खिलाफ कई शर्तें लगाईं, जिनमें जांच एजेंसी को अपना मोबाइल फोन नंबर प्रदान करना, उसके अलावा किसी अन्य मोबाइल फोन का उपयोग नहीं करना और चौबीसों घंटे लाइव लोकेशन चालू रखना शामिल था। सुप्रीम कोर्ट ने उमर के बिना अनुमति दिल्ली छोड़ने पर भी रोक लगाई। साथ ही अदालती कार्यवाही में भाग लेने और जांच एजेंसी के बुलाने के अलावा उनके उत्तर प्रदेश में प्रवेश करने पर भी रोक रहेगी। वह तीसरे दिन नोएडा पुलिस के सामने उपस्थिति दर्ज कराएंगे।