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प्रशांत भूषण की दलील से सुप्रीम कोर्ट नाराज, कहा- यह संस्था सरकार की बंधक नहीं

Mon, 27 Apr 2020 01:53 PM IST
Sneha Baluni न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रवासी मजदूर (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
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कोरोना वायरस के कारण देशभर में लागू लॉकडाउन के बीच प्रवासी मजदूरों की आवाजाही का मामला उच्चतम न्यायालय पहुंच चुका है। सोमवार को न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई भी की। परंतु इस दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की एक दलील को सुन सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह संस्था सरकार की बंधक नहीं है।

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दरअसल, उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कोरोना वायरस संक्रमण के परीक्षण के बाद अपने घर लौटने के इच्छुक कामगारों को जाने की अनुमति देने के लिए दायर याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने केंद्र सरकार को मामले की जांच करने और दो राज्यों के बीच मजदूरों की आवाजाही के मामले में कार्रवाई करने का आदेश दिया।

शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि न्यायालय सरकार के कथन का सत्यापान किए बगैर ही उस पर विचार कर रही है जबकि लोगों, विशेषकर पलायन करने वाले कामगारों के मौलिक अधिकार लागू नहीं किए जा रहे हैं।
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शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान भूषण के इस कथन पर न्यायमूर्ति एनवी रमण, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति बीआर गवई ने अप्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें (प्रशांत भूषण) व्यवस्था पर भरोसा ही नहीं है तो फिर न्यायालय को उन्हें क्यों सुनना चाहिए। भूषण जनहित याचिका दायर करने वाले अहमदाबाद आईआईएम के पूर्व प्रभारी निदेशक जगदीप ए छोकर और अधिवक्ता गौरव जैन की ओर से अदालत में पैरवी कर रहे थे।

अपनी दलील में भूषण ने कहा कि इस संस्था का सृजन संविधान द्वारा किया गया है लेकिन पलायन करने वाले इन कामगारों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है और मुझे अपनी नाराजगी जाहिर करने का हक है। पीठ ने भूषण से कहा कि आपको न्यायपालिका में भरोसा नहीं है। यह संस्था किसी की बंधक नहीं है।

इस पर भूषण ने सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा। वह गलत हो सकते हैं, लेकिन कुछ पूर्व न्यायाधीशों ने भी यही राय जाहिर की है। पीठ ने भूषण से कहा कि वह पिछले 30 साल से यहां वकालत करने का दावा करते हैं तो उन्हें पता ही होगा कि कुछ आदेश पक्ष में होते हैं और कुछ नहीं। इसलिए उन्हें ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए।

वहीं केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी भूषण पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें यह गलतफहमी नहीं रहनी चाहिए कि अकेले वही हैं जिन्हें मौलिक अधिकारों के अमल की चिंता है।

मेहता ने कहा कि इस मसले के प्रति सरकार अधिक चिंतित है और इन श्रमिकों को हर संभव मदद उपलब्ध कराने का प्रयास कर रही है। भूषण ने कहा कि यदि इस मामले में उनके बतौर वकील पेश होने पर आपत्ति है तो वह इससे हटने के लिए तैयार हैं और कोई अन्य वकील इसमें पेश होगा।

इस पर पीठ ने कहा कि उसने मामले से हटने के लिए नहीं कहा है। भूषण ने कहा कि लगता है कि केंद्र सरकार ने अपनी आंखें मूंद रखी हैं और उसे लॉकडाउन के दौरान इन कामगारों की मजबूरी की ओर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि 90 फीसदी से ज्यादा कामगारों को राशन या मजदूरी नहीं मिली है। वे बदहाली की अवस्था में हैं और उन्हे अपने पृथक स्थानों पर जाने की अनुमति दी जानी चाहिए।

हालांकि, मेहता ने भूषण की इस बात का विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह गलत रिपोर्ट है। उन्होंने सवाल भी उठाया कि याचिकाकर्ताओं ने किस आधार पर यह आंकड़े पेश किए हैं? उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार इस मसले पर राज्यों से परामर्श कर रही है कि इन कामगारों या प्रवासी मजदूरों को कैसे उनके गृह राज्य भेजा जाए। साथ ही कितने श्रमिकों को कैसी और किस तरह की मदद दी जाए।

पीठ ने मेहता से कहा कि इसका मतलब यह हुआ कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर गौर करने के लिए तैयार है। मेहता ने कहा कि सरकार हर पहलू पर गौर कर रही है और इसमें याचिकाकर्ता के विचारों की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने न्यायालय से अनुरोध किया कि याचिका को लंबित नहीं रखा जाए क्योंकि इसी तरह के अनुरोध के साथ पहले ही कई याचिकाएं लंबित हैं।

भूषण ने न्यायालय से अनुरोध किया कि कामगारों को एक से दूसरे राज्य भेजने की अनुमति दी जाए, जिस पर मेहता ने आपत्ति की और कहा कि व्यापक जनहित को ध्यान में रखते हुए सभी पहलुओं पर विचार करना सरकार का काम है। उन्होंने पीठ से अनुरोध किया कि इस याचिका पर नोटिस और निर्देश नहीं दिए जाएं क्योंकि इससे गलत संदेश जाएगा। साथ ही वह अपना जवाब दो सप्ताह के भीतर दाखिल कर देंगे।

पीठ ने कहा कि वह जवाब देने के लिए एक सप्ताह का वक्त दे रही है। केंद्र बताए कि क्या इन कामगारों को अंतरराज्यीय आवागमन की अनुमति देने का कोई प्रस्ताव है। इस बीच, शीर्ष अदालत ने अधिवक्ता अलख आलोक श्रीवास्तव के उस आवेदन का निस्तारण कर दिया जिसमें कामगारों के अंतरराज्यीय आवागमन पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया था।

पीठ ने कहा कि इस मुद्दे पर गौर करना सरकार का काम है। शीर्ष अदालत ने कहा कि केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय कायम करना उसका काम नहीं है और इस संबंध में केंद्र सरकार को ही आवश्यक कार्रवाई करनी है।

छोकर और जैन ने अपनी याचिका में कहा है कि इन कामगारों को अपने परिवारों से दूर रहने और अनिश्चित्ता वाले माहौल में रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 19 (5) के प्रावधान के इतर अनुचित प्रतिबंध है।

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