सुप्रीम कोर्ट ने ‘बयान बहादुरों’ के लिए लक्ष्मण रेखा तय करने का निर्णय लिया है। वह यह तय करेगा कि जन सेवा से जुडे़ प्रतिनिधि और अधिकारी किस हद तक बयान दे सकते हैं। इस मसले पर अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी और वरिष्ठ वकील फली एस नरीमन के बाद अब एक और वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे को अदालत की मदद करने को कहा गया है।
न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मुख्य मुद्दा यह है कि बोलने और अभिव्यक्ति के अधिकार पर किस हद तक आजादी है। क्या इस अधिकार पर जीने और स्वच्छंदता के मूल अधिकार का भी प्रभाव पड़ता है? मालूम कि बुलंदशहर गैंगरेप मामले को लेकर उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री आजम खान द्वारा दिए बयान के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल उठाया था।
हालांकि बाद में आजम खान ने अपने बयान पर माफी मांग ली थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस बात का परीक्षण करने का निर्णय लिया था कि पब्लिक ऑफिस में बैठा व्यक्ति किस हद तक बयान दे सकता है।