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पैकेज्ड फूड लेबलिंग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: सरकार से पूछा सवाल- क्या भारत को अविकसित देश बने रहना चाहिए?

Sat, 15 Aug 2026 03:38 PM IST
Devesh Tripathi पीटीआई, नई दिल्ली

सार

पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर पोषण संबंधी चेतावनी को स्पष्ट बनाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से ठोस कदम उठाने को कहा है। अदालत ने लेबल के डिजाइन और उसमें इस्तेमाल होने वाले संकेतों को लेकर विशेषज्ञों की राय लेने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान पीठ ने विकसित देशों में अपनाए जा रहे मानकों का हवाला देते हुए भारत की व्यवस्था को लेकर सरकार के रुख पर सवाल उठाया।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर फ्रंट-ऑफ-पैकेज लेबलिंग (एफओपीएल) के दृश्य स्वरूप पर केंद्र को फैसला लेने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या भारत को अविकसित देश बना रहना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह केंद्र सरकार के इस रुख को स्वीकार नहीं करती कि अंतरराष्ट्रीय मानकों, खासकर विकसित देशों के मानकों के अनुरूप चलना संभव नहीं है।
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फ्रंट-ऑफ-पैकेज लेबलिंग खाद्य पैकेट पर दी जाने वाली पोषण संबंधी जानकारी का एक ग्राफिक होता है। इससे उपभोक्ताओं को खाद्य पदार्थ खरीदते समय सही फैसला लेने और स्वस्थ आहार चुनने में मदद मिल सकती है।

किसने दायर की याचिका?
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने गुरुवार को जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। यह याचिका सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट '3एस एंड आवर हेल्थ सोसाइटी' ने दायर की है। इसमें केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर अनिवार्य एफओपीएल लागू करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
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पीठ ने कहा कि एफओपीएल जागरूकता पैदा करने के लिए जरूरी है। खासकर बढ़ते बच्चों के लिए यह महत्वपूर्ण है, जो तेजी से जंक फूड के आदी हो रहे हैं। अदालत ने पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर चेतावनी वाले लेबल शुरू करने में देरी को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) को भी फटकार लगाई। पीठ ने कहा कि मोटापे को भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती के रूप में मान्यता दी जा चुकी है।

एफओपीएल पर सुप्रीम कोर्ट की केंद्र को दो टूक
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चाहर ने जब कहा कि पैकेजिंग के अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करना मुश्किल होने के कारण एफओपीएल पर अदालत के सुझाव पर विचार करना संभव नहीं है, तो न्यायमूर्ति पारदीवाला ने पूछा, "क्या आप अदालत को मजाक समझ रहे हैं?"

चिली, इस्राइल और कनाडा सहित कई देशों में अपनाई जा रही व्यवस्थाओं और नियमों का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा, "हम केंद्र के उस रुख को स्वीकार नहीं करते जब वह कहता है कि अंतरराष्ट्रीय मानकों, खासकर विकसित देशों के मानकों के अनुरूप चलना संभव नहीं है। क्या भारत को अविकसित देश बना रहना चाहिए? यह सवाल हम केंद्र के सामने विचार के लिए रख रहे हैं।"

पीठ ने कहा कि दुनिया को पता होना चाहिए कि भारत अपने नागरिकों के समग्र स्वास्थ्य को लेकर चिंतित है, खासकर बढ़ते बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर। अदालत ने केंद्र से विशेषज्ञों से सलाह लेने और एफओपीएल के दृश्य स्वरूप पर फैसला करने को कहा। इसमें रंगीन संकेतक, व्याख्यात्मक शब्द, अंक, अक्षर या प्रतीक और प्रतिशत जैसी जानकारी शामिल हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से क्या कहा?
पीठ ने सख्त लहजे में कहा, "अगर केंद्र खुद ऐसा करता है तो बहुत अच्छा है। अन्यथा हम आगे के निर्देश जारी करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएंगे।" अदालत ने सरकार को अंतिम फैसला रिकॉर्ड पर रखने के लिए दो सप्ताह का समय दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि उसके विचार में केंद्र को एफओपीएल से जुड़े बदलाव लागू करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह मामला पहले से उसके संज्ञान में है। इसका संकेत आर्थिक सर्वेक्षण में दिए गए सुझाव से भी मिलता है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि संतुलित और पोषक तत्वों से भरपूर आहार बच्चे के विकास, वृद्धि और समग्र स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। इसका असर केवल व्यक्ति के शारीरिक स्वास्थ्य पर नहीं पड़ता, बल्कि यह उसके महसूस करने, प्रदर्शन करने और व्यवहार करने के तरीके को भी प्रभावित करता है।

जनहित याचिका में क्या की गई है मांग?
'3एस एंड आवर हेल्थ सोसाइटी' की जनहित याचिका में भारत में गैर-संचारी रोगों के बढ़ते बोझ का उल्लेख किया गया था। इसमें कहा गया कि एफओपीएल खाद्य पदार्थों में अधिक मात्रा में मौजूद चीनी, नमक और संतृप्त वसा की जानकारी प्रमुखता से दे सकता है। ये मधुमेह, मोटापा, हृदय संबंधी बीमारियों और कुछ प्रकार के कैंसर जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के प्रमुख कारण हैं।

याचिका में देशभर में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों में चिंताजनक बढ़ोतरी का भी उल्लेख किया गया। इसमें कहा गया कि गैर-संचारी रोग अब हर साल 60 लाख से अधिक मौतों के लिए जिम्मेदार हैं। मधुमेह एक ऐसी बीमारी बनकर उभरा है, जो चुपचाप फैल रही है और करीब हर चार में से एक भारतीय को प्रभावित कर रही है। इस मामले पर अगली सुनवाई 10 सितंबर को होगी।
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