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NOTA से क्या बेहतर हुए जनप्रतिनिधि?: सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, महिलाओं की भागीदारी की सराहना

Tue, 24 Feb 2026 04:39 PM IST
राहुल कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या विधानसभा और आम चुनावों में नोटा विकल्प के प्रावधान से चुने गए नेताओं की गुणवत्ता में सुधार हुआ है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों में नोटा (उपरोक्त में से कोई नहीं) विकल्प के प्रभाव को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि इससे देश में चुने गए प्रतिनिधियों की गुणवत्ता में कोई सुधार हुआ है या नहीं। अदालत ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें मांग की गई है कि नोटा का विकल्प हर चुनाव में अनिवार्य किया जाए, यहां तक कि उन सीटों पर भी जहां केवल एक ही उम्मीदवार मैदान में हो।

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सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के एक प्रावधान को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें यह तर्क दिया गया था कि यह प्रावधान मतदाताओं को एकल उम्मीदवार की स्थिति में नोटा विकल्प चुनने से रोकता है।

याचिका में मांग की गई थी कि सभी चुनावों में, जिनमें एकल उम्मीदवार वाले चुनाव भी शामिल हैं, नोटा विकल्प को अनिवार्य बनाया जाए। नोटा (उपरोक्त में से कोई नहीं) को 2013 में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम भारत सरकार मामले में ऐतिहासिक फैसले में दिए गए निर्देश के मद्देनजर लागू किया गया था।
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कमजोर वर्ग की चुनाव में भागीदारी अधिक- कोर्ट
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मौखिक टिप्पणियों में कहा कि भारत में पढ़े-लिखे और संपन्न वर्ग की तुलना में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की मतदान भागीदारी ज्यादा रहती है। जस्टिस बागची ने कहा, क्या नोटा से निर्वाचित नेताओं की गुणवत्ता बेहतर हुई है? आंकड़े बताते हैं कि शिक्षित और संपन्न लोग कम वोट डालते हैं, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग ज्यादा मतदान करता है। 

महिला वोटर्स की संख्या लगातार बढ़ी
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कभी-कभी हमें लगता है कि हमें कोई ऐसा सिस्टम बनाना चाहिए जो जरूरी हो, लेकिन सख्त न हो, ताकि लोग जाकर वोट दें।  सिस्टम सजा देने वाला न हो। ग्रामीण इलाकों में.. जिन महिलाओं को मजदूरी या कंस्ट्रक्शन के काम करने से छूट मिली हुई है.. वे राहत की सांस लेती हैं जब वे ग्रुप में वोट डालने जाती हैं, गाने गाती हैं। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने यह भी कहा, महिला वोटर्स की संख्या लगातार बढ़ी है।


सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में नोटा का विकल्प उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। मंगलवार को संक्षिप्त सुनवाई के दौरान, जस्टिस बागची ने पूछा, क्या नोटा के लागू होने से निर्वाचित नेताओं की गुणवत्ता में सुधार हुआ है? उन्होंने कहा कि नोटा एक व्यवस्था नहीं बन सकती क्योंकि अधिकतम वोट मिलने के बावजूद यह एक भी सीट नहीं भर सकती। पीठ ने यह भी कहा कि अच्छे उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के लिए चुनावों में मतदान को अनिवार्य बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए।

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पीठ ने इस बढ़ती प्रवृत्ति पर भी खेद व्यक्त किया कि शिक्षित और संपन्न मतदाता, अशिक्षित और महिलाओं की तुलना में चुनावों में बहुत कम मतदान करते हैं। पीठ ने यह भी कहा कि चुनावों में मतदान को अनिवार्य बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए ताकि अच्छे उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित हो सके। अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमानी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा, "हम बहुत सारे काल्पनिक आधारों पर विचार कर रहे हैं। इस तरह कानून की परीक्षा नहीं ली जा सकती। मतदान का अधिकार सांविधानिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने अब याचिका पर सुनवाई के लिए 17 मार्च की तारीख तय की है।

 
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