पीठ ने सख्त लहजे में कहा, आप मजाक कर रहे हैं। वकील के परिवार के किसी सदस्य की मौत हो जाती है तो पूरी बार अवकाश ले लेती है। आखिर क्या है यह? हालांकि, पीठ ने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अपील देहरादून के वकीलों के एक समूह ने भी दाखिल की थी।
विधि आयोग ने कहा था, कार्यदिवसों के नुकसान से लंबित मामले बढ़ रहे
25 सितंबर, 2019 को हाईकोर्ट ने अपने फैसले में विधि आयोग के 266वीं रिपोर्ट का हवाला भी दिया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि वकीलों की हड़ताल से कार्यदिवस का नुकसान हो रहा है, जिससे अदालतों का कामकाज प्रभावित हो रहा है और लंबित मामलों की संख्या में दिनोंदिन बढ़ोतरी हो रही है।
हाईकोर्ट ने यह कहा था फैसले में
हाईकोर्ट द्वारा विधि आयोग को भेजी जानकारियों के मुताबिक, 2012-16 के दौरान सिर्फ देहरादून जिले में ही वकील 455 दिनों तक हड़ताल पर रहे थे। वहीं, हरिद्वार में 515 दिन तक हड़ताल पर थे। उस वक्त हाईकोर्ट ने भी विधि आयोग की रिपोर्ट पर संज्ञान लिया था कि अदालतों से वकील कभी स्थानीय, कभी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर नदारद रहते हैं। इसे कभी जायज नहीं ठहराया जा सकता है और न ही कभी इसके लिए वकीलों की ओर से ठोस वजह ही बताई गई।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में भी उल्लेख करते हुए कहा था, पाकिस्तान के स्कूल में बम धमाके, श्रीलंका के संविधान में संशोधन, अंतरराज्यीय जल विवाद, किसी वकील पर हमला या उसकी हत्या, नेपाल में भूकंप, वकीलों के किसी करीबी रिश्तेदार की मौत, दूसरे राज्यों के वकीलों के प्रति एकजुटता जाहिर करना, सामाजिक कार्यकर्ताओं के आंदोलन का नैतिक समर्थन, भारी बारिश और यहां तक कि कवि सम्मेलन भी वकीलों की कोर्ट से गैर मौजूदगी की वजह रहे हैं।