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सुप्रीम कोर्ट: वैवाहिक दुष्कर्म पर अदालत सख्त, कहा- शादी के बाद पत्नी की सहमति का अधिकार खत्म नहीं होता है

Wed, 09 Sep 2026 07:08 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक दुष्कर्म से जुड़े मामलों पर संवैधानिक जांच शुरू करने का फैसला किया है। अदालत पहले कर्नाटक हाईकोर्ट के उस मामले की अपील सुनेगी, जिसमें पत्नी को कथित तौर पर यौन गुलाम की तरह रखने के आरोप में पति पर मुकदमा चलाने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने कहा कि शादी से व्यक्तिगत स्वायत्तता खत्म नहीं होती। लेकिन क्या मौजूदा कानून के तहत पति पर दुष्कर्म का मुकदमा चल सकता है? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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शादी के बाद पत्नी की सहमति के बिना यौन संबंध बनाने को दुष्कर्म के दायरे में लाया जा सकता है या नहीं, इस बेहद अहम सवाल पर सुप्रीम कोर्ट अब विस्तार से सुनवाई करेगा। अदालत ने साफ किया है कि शादी का मतलब किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता खत्म होना नहीं है। हालांकि, मामला केवल सामाजिक सोच का नहीं, बल्कि आपराधिक कानून और संविधान की कसौटी का भी है। सुप्रीम कोर्ट पहले कर्नाटक हाईकोर्ट से जुड़े उस मामले की अपील सुनेगा, जिसमें पत्नी को कथित तौर पर यौन गुलाम की तरह रखने के आरोप में पति पर दुष्कर्म का मुकदमा चलाने की अनुमति दी गई थी।

पहले किस अपील पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट?

  • मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं। पीठ ने कहा कि वह सबसे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले से जुड़ी अपील पर सुनवाई करेगी, जिसमें पत्नी के साथ कथित यौन हिंसा के मामले में पति के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा चलाने की अनुमति दी गई थी। 
  • वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह पत्नी की ओर से पेश हुईं। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने इस मामले में पत्नी को लगभग यौन गुलाम की तरह रखे जाने की स्थिति को देखते हुए मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी। उनका तर्क है कि मौजूदा कानून की व्याख्या के जरिए भी ऐसे मामले में मुकदमा चलाया जा सकता है, यानी वैवाहिक दुष्कर्म के अपवाद को तुरंत खत्म करना जरूरी नहीं है।

क्या मौजूदा कानून की व्याख्या करके पति पर मुकदमा चलाया जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट के सामने इस मामले में दो बड़े सवाल हैं। पहला, क्या मौजूदा वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद की सीमित व्याख्या करके कुछ मामलों में पति के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा चलाया जा सकता है। दूसरा, क्या यह अपवाद खुद संविधान का उल्लंघन करता है और इसे खत्म किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा है कि वह दोनों सवालों पर विचार करेगी, लेकिन पहले कर्नाटक की अपील के जरिए कानून की व्याख्या के सवाल को देखेगी और उसके बाद संवैधानिक चुनौती पर विचार करेगी। वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने कहा कि कानून की व्याख्या और उसकी संवैधानिक वैधता के सवालों को पूरी तरह अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने निर्भया मामले के बाद दुष्कर्म कानून में हुए बदलावों का भी उल्लेख किया।

क्या शादी के बाद महिला की व्यक्तिगत स्वायत्तता खत्म हो जाती है?

न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि शादी से किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता खत्म नहीं होती। अदालत ने विवाहित महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों से जुड़े सवालों को महत्वपूर्ण माना। हालांकि, पीठ ने यह भी कहा कि उसके सामने आपराधिक कानून का सवाल है। इसलिए पहले यह देखना होगा कि वैवाहिक दुष्कर्म का अपवाद अनुचित या साफ तौर पर मनमाना तो नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अपवाद पति को यौन हिंसा से जुड़े हर संभावित आपराधिक परिणाम से सुरक्षा नहीं देता। अगर यौन हिंसा से गंभीर चोट या मौत होती है, तो दूसरे आपराधिक प्रावधान लागू हो सकते हैं। पीठ ने पुराने फुलमोनी मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें बहुत कम उम्र की लड़की के साथ गंभीर यौन हिंसा के बाद उसकी मौत हो गई थी।

निर्भया कांड के बाद दुष्कर्म कानून में क्या बदला?

  • सुनवाई के दौरान वकीलों ने बताया कि 2012 के निर्भया कांड के बाद भारत के यौन अपराधों से जुड़े कानून में बड़े बदलाव किए गए थे। दुष्कर्म की कानूनी परिभाषा को केवल पुरुष जननांग के प्रवेश तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि दूसरे प्रकार के प्रवेश को भी इसमें शामिल किया गया। 
  • इसी दौरान वैवाहिक अपवाद में इस्तेमाल होने वाले शब्दों को भी बदला गया और यौन संबंध की जगह यौन संबंध या यौन कृत्य किया गया। करुणा नंदी ने यह भी कहा कि शादी के भीतर होने वाली दूसरी तरह की यौन हिंसा पर भी इस अपवाद का असर पड़ता है। उन्होंने बीएनएस में धारा 377 को हटाए जाने का मुद्दा भी उठाया और पूछा कि ऐसे मामलों में कानूनी उपाय क्या रह जाते हैं।

अदालत आपराधिक कानून में अचानक बदलाव को लेकर क्यों सतर्क?

  • न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालतों को आपराधिक कानून की जांच करते समय सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि ऐसे कानून का किसी व्यक्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक जांच में व्यक्ति की मंशा, जिम्मेदारी और मौलिक अधिकारों की व्याख्या जैसे पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है, ताकि कानून नागरिकों के लिए अचानक और अप्रत्याशित परिणाम पैदा न करे। 
  • अदालत ने यह भी कहा कि कोई कानून दो कारणों से असंवैधानिक हो सकता है। पहला, अगर उसे बनाने का अधिकार विधायिका के पास नहीं था। दूसरा, अगर वह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। सुनवाई में यह भी कहा गया कि संसद ने 2023 में बीएनएस बनाते समय इस मुद्दे पर विचार किया था। इसलिए वैवाहिक अपवाद को बनाए रखने के पीछे सरकार का पक्ष भी अदालत के सामने रखा जाएगा।

दिल्ली हाईकोर्ट के बंटे फैसले से सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला?

इस विवाद की एक अहम कड़ी दिल्ली हाईकोर्ट का 11 मई 2022 का बंटा हुआ फैसला है। दो जजों की पीठ में न्यायमूर्ति राजीव शकधर और न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर ने वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद की संवैधानिक वैधता पर अलग-अलग राय दी थी। न्यायमूर्ति शकधर ने इस अपवाद को खत्म करने के पक्ष में फैसला दिया था, जबकि न्यायमूर्ति हरि शंकर ने इसे बरकरार रखा था। इसके बाद मामला अपील के जरिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार अपना जवाब पहले ही दाखिल कर चुकी है और वह कानून से जुड़े सवालों पर अदालत की मदद करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के जवाब की प्रतियां सभी वकीलों को दो दिनों के भीतर देने का निर्देश दिया है। मामले पर अंतिम सुनवाई तीन सप्ताह बाद बुधवार और गुरुवार को होने की बात कही गई है। अब सुप्रीम कोर्ट यह तय करने की दिशा में आगे बढ़ेगा कि मौजूदा वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद की व्याख्या संविधान के अनुरूप की जा सकती है या खुद यह प्रावधान संवैधानिक जांच में टिकता है।
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