सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के एक कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर को मिलने वाले मुआवजे की रकम पांच लाख रुपये से बढ़ाकर 7.5 लाख रुपये कर दी है। बता दें कि मजदूर ने नौकरी से निकाले जाने के बाद लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी थी, जिसे ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है। उसे नौकरी पर वापस नहीं रखा गया था। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने यह आदेश कल्लू खान की अपील पर सुनवाई करते हुए दिया। खान ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस फैसले की समीक्षा करने से इनकार करने को चुनौती दी थी, जिसमें उसे नौकरी पर वापस रखने और 50 प्रतिशत बकाया वेतन देने के बजाय पांच लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया गया था।
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि मुआवजे में यह बढ़ोतरी मामले के खास तथ्यों को देखते हुए की गई है और इसे नजीर (मिसाल) नहीं माना जाना चाहिए। जस्टिस भुइयां की अगुवाई वाली बेंच ने कहा, 'इस बात को ध्यान में रखते हुए कि अपीलकर्ता 10 सितंबर, 1998 से ही कानूनी उपाय अपना रहा था, जिसका नतीजा चार अगस्त, 2025 के आदेश के रूप में निकला और यह भी कि अगर उसे नौकरी पर वापस रखा जाता तो वह और तीन साल तक सेवा करता, हमारी राय में 7,50,000 रुपये का मौद्रिक मुआवजा देना न्याय के हित में होगा।' सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि बढ़ा हुआ मुआवजा अपीलकर्ता को एक महीने के भीतर दिया जाए।
क्या है ये मामला?
यह मामला कल्लू खान की कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर के तौर पर नौकरी खत्म किए जाने से जुड़ा था, जिसे उसने इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 की धारा 2A(2) के तहत चुनौती दी थी। नौकरी से निकाले जाने को चुनौती देने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाने से पहले उसने 19 नवंबर, 1990 से एक सितंबर, 1998 तक काम किया था। लेबर कोर्ट ने 18 फरवरी, 2020 को दिए अपने फैसले में उसे नौकरी पर वापस रखने, सेवा की निरंतरता बनाए रखने, पूरा बकाया वेतन और अन्य संबंधित लाभ देने का निर्देश दिया था। हालांकि, जिला शिक्षा अधिकारी की ओर से दायर एक रिट याचिका पर, राजस्थान हाई कोर्ट की सिंगल जज बेंच ने 5 मार्च, 2021 को फैसले में कुछ बदलाव किए। उन्होंने नौकरी पर वापस रखने के निर्देश को तो बरकरार रखा, लेकिन बकाया वेतन (बैकवेजेज) को 100 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत कर दिया।
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इसके बाद, हाई कोर्ट की डिवीन बेंच ने 4 अगस्त, 2025 के एक आदेश के जरिए नौकरी पर वापस रखने के बजाय 'सर्विस की निरंतरता' और 50 प्रतिशत बकाया वेतन की जगह पांच लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया था। खान ने स्पेशल लीव पिटिशन (एसएलपी) दायर करके सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी। 12 दिसंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया, लेकिन उन्हें कानून के तहत उपलब्ध उचित उपाय अपनाने की छूट दी। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट के आदेश की समीक्षा की मांग की। हालांकि, डिवीन बेंच ने 11 फरवरी, 2026 को उनकी समीक्षा याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद उन्हें फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।