सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एक दीवानी मामले में राज्य सरकार की पहली अपील को 1612 दिन की देरी के बावजूद स्वीकार किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए उसे रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने इसे कानून की अनदेखी बताया।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने हाईकोर्ट के 1 सितंबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेज दिया। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा, हाईकोर्ट ने देरी माफ करते समय यह नहीं बताया कि राज्य सरकार की ओर से ऐसा कौन सा कारण प्रस्तुत किया गया, जिसके आधार पर इतनी लंबी देरी को उचित ठहराया जा सके।
पीठ ने कहा, हमें यह कहते हुए खेद है कि हाईकोर्ट के आदेश की भाषा से ऐसा प्रतीत होता है कि हाईकोर्ट ने 1612 दिनों की देरी को सिर्फ मांग करने मात्र पर माफ कर दिया। मामले की सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता शंकरगिर की ओर से वकील दुष्यंत पराशर और राज्य सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलीलें पेश की।
देरी माफी व सीमा बद्धता से जुड़ा कानून पूरी तरह स्थापित, अदालतें सख्ती से पालन करें
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, देरी माफी और सीमा बद्धता से संबंधित कानून पूरी तरह से स्थापित है और अदालतों को इसका सख्ती से पालन करना चाहिए। पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि क्या हाईकोर्ट को इस विषय में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों की जानकारी थी। अदालत ने उन मामलों का उल्लेख किया जिनमें यह स्पष्ट किया गया है कि ‘पर्याप्त कारण’ की कसौटी क्या होनी चाहिए और देरी माफी की याचिकाओं पर किस प्रकार विचार किया जाना चाहिए।
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि देरी कोविड-19 महामारी के कारण हुई थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इन्कार करते हुए कहा कि हाईकोर्ट के आदेश में इस संबंध में एक शब्द भी दर्ज नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि महामारी को कारण बनाया जा रहा था तो उसे स्पष्ट रूप से आदेश में जिक्र किया जाना चाहिए था।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को हाईकोर्ट को वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि वह दोनों पक्षों को पुनः सुनने के बाद कानून के तहत नया आदेश पारित करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि देरी माफी जैसे मामलों में न्यायिक अनुशासन और स्थापित कानूनी सिद्धांतों का पालन अत्यंत आवश्यक है।