सुप्रीम कोर्ट ने एलजबीटीक्यू समुदाय के लिए समलैंगिक विवाह, गोद लेना और सरोगेसी जैसे नागरिक अधिकारों की मांग वाली पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस एनवी रमण की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने 11 जुलाई को चैंबर में तुषार नैयर की ओर से पुनर्विचार याचिका को विचार के बाद खारिज कर दिया।
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि यह याचिका 29 अक्तूबर, 2018 के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई है, जिसमें नैयर की याचिका को खारिज कर दिया गया था। हमने पुनर्विचार याचिका पर उसकी मेरिट पर विचार किया। हमारी राय में इनमें पूर्व के आदेश पर पुनर्विचार का कोई मामला नहीं बनता है।
शीर्ष अदालत ने पिछले साल नैयर की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें एलजीबीटीक्यू समुदाय के सदस्यों से संबंधित मुद्दे उठाते हुए कहा गया था कि पांच सदस्यीय संविधान पीठ पहले ही समलैंगिकता के मामले में विचार कर चुकी है। इस पर कोर्ट ने कहा था कि नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत सरकार मामले में 6 सितंबर, 2018 को अदालत के फैसले के बाद हम इस पर विचार के इच्छुक नहीं हैं।
तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस फैसले में सर्वसम्मति से कहा था कि परस्पर सहमति से वयस्कों के बीच एकांत में स्थापित होने वाले अप्राकृतिक यौन संबंध अपराध नहीं है। साथ ही कोर्ट ने परस्पर सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित करने को अपराध की श्रेणी में रखने संबंधी भारतीय दंड संहिता की धारा 377 का प्रावधान निरस्त कर दिया था।