सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में राम मंदिर स्थल से निकली कलाकृतियों और प्राचीन वस्तुओं के संरक्षण के लिए जनहित याचिका (पीआईएल) दायर करने वाले चार याचिकाकर्ताओं को राहत देते हुए एक लाख रुपये जमा करने पर माफी दे दी। इनकी पीआईएल को तुच्छ करार देते हुए कोर्ट ने इन पर चार लाख रुपये जुर्माना लगाया था।
जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस बीआर गवई की पीठ को वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने बताया, याचिकाकर्ता बहुत विनम्र पृष्ठभूमि के हैं और उन्हें गलती का अहसास है। उन्होंने कहा कि सतीश चिंधूजी शंभारकर और अन्य को याचिका दायर करने की गलत सलाह दी गई थी।
उन्होंने पीठ से याचिकाकर्ताओं के प्रति रहम बरतने की अपील की। साथ ही बताया कि उन्होंने चार लाख रुपये की जगह एक लाख रुपये का जुर्माना भर दिया है। इस पर पीठ ने कहा, हम उनके आग्रह को इस शर्त पर स्वीकार करते हैं कि वे भविष्य में ऐसा दुस्साहस नहीं करेंगे। साथ ही पीठ ने एक लाख रुपये की राशि को ही पूर्ण जुर्माना मानते हुए शेष राशि जमा करने से छूट दे दी।
सुप्रीम कोर्ट ने 20 जुलाई को पीआईएल को खारिज कर दिया था और चारों याचिकाकर्ताओं पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था। जस्टिस अरुण मिश्रा की पीठ ने याचिकाकर्ताओं से कहा था कि वे जनहित में ऐसी याचिका कैसे दाखिल कर सकते हैं? कोर्ट ने एक महीने में ही जुर्माना जमा करने के आदेश दिए थे।
पीठ ने याचिका पर कहा था कि शीर्ष अदालत की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने रामजन्मभूमि विवाद पर फैसला दिया है और यह कोर्ट के आदेश को खत्म करने का प्रयास है। पीठ ने याचिका को बकवास करार देते हुए याचिका दायर करने वाले संगठनों की गतिविधियों की सीबीआई जांच कराने की चेतावनी दी थी। पीठ ने कहा था कि यह अयोध्या मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रद्द करने की कोशिश है।