राजनीतिक दलों को आयकर कानून के दायरे से अलग रखने को सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक बताया है। शीर्ष अदालत ने कहा है सरकार पर निर्भर है कि वह किसे आयकर से छूट दे और किसे नहीं। चीफ जस्टिस जेएस खेहर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने राजनीतिक दलों को आयकर कानून के दायरे से अलग रखने को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। पीठ ने कहा कि राजनीतिक दलों को अपनी विचारधाराओं के प्रचार-प्रसार के लिए पैसे की जरूरत होती है इसलिए वे लोगों से फंड जुटाते हैं। शासन और कानून बनाने में उनकी भागीदारी होती है।
पीठ ने कहा कि कृषि से आमदनी को आयकर कानून से दूर रखा गया है तो राजनीतिक दलों को भी आयकर कानून से दूर रखा जा सकता है। यह देश पर शासन करने वाले पर निर्भर है कि वह किसे आयकर के दायरे में रखना चाहता है और किसे छूट प्रदान करना चाहता है।
याचिकाकर्ता वकील एम एल शर्मा ने पीठ के समक्ष अपनी दलील रखते हुए जनप्रतिनिधि कानून के उस प्रावधान का विरोध किया, जिसमें राजनीतिक दलों को पहली बार 1989 में जोड़ा गया था। उन्होंने कहा कि संविधान में राजनीतिक दल का जिक्र नहीं है, ऐसे में जनप्रतिनिधि कानून में इसे जोड़ा जाना असंवैधानिक है। चूंकि संविधान राजनीतिक दल को लेकर मौन है लिहाजा उसे आयकर में छूट देने का सवाल नहीं उठता है। लेकिन पीठ ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि संविधान में हिन्दू संयुक्त परिवार की बात नहीं है लेकिन कर कानून में जिसका जिक्र है।