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Supreme Court: बंगाल चुनाव से पहले अधिकारियों के तबादलों पर कोर्ट की मुहर, चुनौती देने वाली याचिका खारिज

Thu, 16 Apr 2026 03:09 PM IST
Riya Dubey न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के तबादले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। यह तबादले भारतीय चुनाव आयोग द्वारा किए गए थे। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल थे, ने कहा कि इस मामले में उठाए गए कानूनी प्रश्न को फिलहाल खुला रखा जाएगा।
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सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश कलकत्ता हाई कोर्ट के 31 मार्च के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। हाई कोर्ट ने पहले ही जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया था, जिसमें चुनाव आयोग द्वारा किए गए तबादलों को चुनौती दी गई थी। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को होने हैं, जबकि मतगणना 4 मई को की जाएगी।

सोना तस्करी मामला: कन्नड़ अभिनेत्री रान्या राव की नजरबंदी बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने सोना तस्करी मामले में कन्नड़ फिल्म अभिनेत्री हर्षवर्धिनी रान्या राव को बड़ा झटका देते हुए उनके खिलाफ जारी नजरबंदी आदेश को बरकरार रखा है। जस्टिस एमएम सुंदरश व जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने रान्या राव की मां और सह-आरोपी साहिल सरकारिया जैन के परिजन की अपीलों को खारिज कर दिया। ये अपीलें कर्नाटक हाईकोर्ट के 19 दिसंबर 2025 के उस आदेश के खिलाफ थीं, जिसमें दोनों की नजरबंदी को सही ठहराया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों ने सांविधानिक प्रावधानों का पर्याप्त पालन किया है और नजरबंदी आदेश संविधान के अनुच्छेद 22(3)(बी) का उल्लंघन नहीं करता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नजरबंद व्यक्ति को कानूनी सहायता का अधिकार हर मामले में स्वतः नहीं मिलता। कोर्ट के अनुसार, सीओएफईपीओएसए कानून की धारा 8(ई) और संविधान के प्रावधानों के तहत यह अधिकार सीमित है।  

 

पत्नी का भरण-पोषण करना पति का प्राथमिक व निरंतर कर्तव्य: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पत्नी का भरण-पोषण करना पति की एक प्राथमिक और निरंतर जिम्मेदारी है। इसे इस तरह निभाया जाना चाहिए कि पत्नी गरिमा के साथ जीवन जी सके।
जस्टिस संजय करोल व जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने कहा कि भरण-पोषण (मेंटेनेंस) केवल औपचारिक या दिखावटी नहीं होना चाहिए, बल्कि यह निष्पक्ष, उचित और पति की आर्थिक क्षमता तथा दोनों पक्षों की सामाजिक स्थिति के अनुरूप होना चाहिए। पति का दायित्व है कि वह अपनी पत्नी को ऐसा भरण-पोषण दे जिससे वह उसी स्तर की गरिमा के साथ जीवन जी सके, जैसा विवाह के दौरान था।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण की राशि तय करते समय संतुलन बनाए रखना जरूरी है, ताकि यह पत्नी के लिए पर्याप्त हो, लेकिन पति पर अत्यधिक बोझ भी न डाले। अदालत ने इसे प्रतिस्पर्धी हितों के बीच न्यायसंगत संतुलन बनाने की प्रक्रिया बताया। पीठ एक महिला को मिलने वाली मासिक भरण-पोषण राशि 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दी। मामले के अनुसार, दोनों की शादी 7 मई 2023 को नई दिल्ली में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। शादी के बाद पत्नी ससुराल में पति और उसके परिवार के साथ रहती थी, लेकिन संबंधों में तनाव बना रहा। महिला ने आरोप लगाया कि उसे उपेक्षा और शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। 
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सुप्रीम कोर्ट ने दस्तावेज के अनुवाद की खराब गुणवत्ता पर चिंता जताई
सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सहायता मामलों में अपील दाखिल करने के लिए दस्तावेज के खराब अनुवाद पर चिंता व्यक्त की और देशभर के हाईकोर्ट से इस मुद्दे की गंभीरता से जांच करने को कहा। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट से चार सप्ताह के भीतर इस मामले में उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया।

जस्टिस संजय करोल व जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कानूनी सहायता अपील दाखिल करने के लिए दस्तावेज के अनुवाद और प्रेषण हेतु मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) को मंजूरी देते हुए यह निर्देश पारित किया। पीठ ने कहा, हाल ही में कई बार इस अदालत का ध्यान अनुवाद की खराब गुणवत्ता पर गया है। यह दर्शाता है कि इस संबंध में संरचनात्मक परिवर्तन की जरूरत है। संबंधित हाईकोर्ट इस मुद्दे की गंभीरता से जांच करें और चार सप्ताह में निर्णय लें।

 पीठ ने कहा कि यह मानक परिचालन प्रक्रिया (एसओपी) हितधारकों या क्षेत्र के जानकारों की ओर से गहन विचार-विमर्श के बाद तैयार की गई है। सभी हाईकोर्ट को इस पर विचार करना चाहिए। पीठ ने आदेश की एक प्रति सभी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को भेजने का निर्देश दिया।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यद्यपि एसओपी के संपूर्ण कार्यान्वयन का निर्णय हाईकोर्ट के विवेक पर निर्भर है, फिर भी इसमें दी गई समयसीमा बाध्यकारी मानी जाएगी। 
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