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'यह राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा': एआईएडीएमके के बागी विधायकों के खिलाफ याचिका खारिज, कोर्ट ने और क्या कहा?

Mon, 26 Oct 2026 04:43 PM IST
अमन मौर्या पीटीआई, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने एआईएडीएमके के उन छह विधायकों के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी है, जिन्होंने पार्टी व्हिप के खिलाफ वोट देकर इस्तीफा दिया और टीवीके में शामिल हो गए। कोर्ट ने इसे राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा माना।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एआईएडीएमके के उन छह विधायकों के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिन्होंने पार्टी व्हिप के खिलाफ वोट देने के बाद अपनी सीटों से इस्तीफा दे दिया था और बाद में सत्ताधारी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (टीवीके) में शामिल हो गए थे। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने वकील के सुथन की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने इसे राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। सुथन ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी याचिका को खारिज कर दिया गया था।
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याचिका पर पीठ ने क्या टिप्पणी की?
याचिका खारिज करते हुए पीठ ने कहा, 'कोई इस्तीफा देता है और मंत्री बन जाता है, तो यह राजनीतिक प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है।' बता दें कि हाई कोर्ट ने 24 सितंबर को एक जनहित याचिका (पीआईएल) खारिज कर दी थी। इस याचिका में 'चुनाव व्यय सुरक्षा' तंत्र बनाने और दल बदलने वाले एआईएडीएमके के छह विधायकों को पांच साल के लिए अयोग्य घोषित करने की मांग की गई थी। हाई कोर्ट ने कहा कि विधानसभा सीट से इस्तीफा देना संवैधानिक व्यवस्था का ही एक हिस्सा है और न्यायिक आदेश के जरिए इस पर कानून से बाहर की शर्तें नहीं थोपी जा सकतीं।
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याचिका में चुनाव आयोग और तमिलनाडु के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को 'चुनाव व्यय सुरक्षा' तंत्र बनाने का निर्देश देने की भी मांग की गई थी। इसके तहत, अगर कोई मौजूदा विधायक अपनी सीट से इस्तीफा देता है और बाद में उसी सीट पर होने वाले उपचुनाव में फिर से चुनाव लड़ना चाहता है, तो उसे उपचुनाव कराने में खर्च होने वाली सरकारी रकम के बराबर राशि पहले जमा करनी होगी।

मद्रास हाई कोर्ट का क्या फैसला था?
मद्रास हाई कोर्ट ने 13 अक्तूबर को तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष जेसीडी प्रभाकर के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें उन्होंने एआईएडीएमके के छह विधायकों के इस्तीफे स्वीकार कर लिए थे। ये विधायक बाद में सत्ताधारी टीवीके में शामिल हो गए थे। कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश दिया था कि वे एआईएडीएमके व्हिप कृष्णमूर्ति की उस याचिका पर दो महीने के भीतर फैसला लें, जिसमें एस जयकुमार, मरगथम कुमारवेल, पी सत्यभामा और एसक्की सुबैया को विधानसभा से अयोग्य घोषित करने की मांग की गई थी। पेरुंदुरई, मदुरंतकम और धारापुरम विधानसभा क्षेत्रों से चुने गए एस. जयकुमार, मरगथम कुमारवेल और पी. सत्यभामा ने 25 मई, 2026 को सदस्य पद से इस्तीफा दे दिया।

अंबासमुद्रम निर्वाचन क्षेत्र से चुने गए एसक्की सुबैया ने अगले दिन इस्तीफा दे दिया। सी. विजयभास्कर (विरालिमालाई) और एम. आर. विजयभास्कर (करूर) ने क्रमशः 16 और 29 जून को इस्तीफा दिया। ये सभी अप्रैल में हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में एआईएडीएमके के टिकट पर चुने गए थे। इस्तीफा देने के बाद, वे मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सत्ताधारी पार्टी टीवीके में शामिल हो गए। मरगथम कुमारवेल और सत्यभामा ने 6 अक्तूबर को हुए उपचुनावों में टीवीके उम्मीदवारों के तौर पर क्रमशः मदुरंतकम और धारापुरम विधानसभा क्षेत्रों से जीत हासिल की।

क्या संविधान के अनुरूप था इस्तीफा?
पीठ ने कहा कि विधायकों द्वारा दिए गए इस्तीफे असली और स्वेच्छा से थे और ये संविधान की 10वीं अनुसूची के प्रावधानों के अनुरूप थे। स्पीकर के लिए इन इस्तीफों के पीछे के कथित उद्देश्यों की कोई विस्तृत जांच करने की आवश्यकता नहीं थी। पीठ ने कहा कि इसलिए, इन इस्तीफों को स्वीकार करना और उसके परिणामस्वरूप सीटों को रिक्त घोषित करना संवैधानिक रूप से वैध था। पीठ ने बताया कि 13 मई को 25 विधायकों ने एआईएडीएमके के व्हिप का उल्लंघन किया था, जिसके बाद एआईएडीएमके ने तुरंत स्पीकर के समक्ष उन्हें अयोग्य ठहराने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी।
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पीठ ने कहा कि अयोग्यता की याचिका लंबित होने का मतलब यह नहीं है कि स्पीकर इस्तीफा स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि इस्तीफा देना और अयोग्य ठहराया जाना, ये दोनों अलग-अलग संवैधानिक प्रक्रियाएं हैं। पीठ ने आगे कहा कि अयोग्यता की याचिका लंबित होने के बावजूद, स्पीकर इस्तीफों को स्वीकार करने के लिए अधिकृत थे। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस्तीफे स्वीकार कर लेने से अयोग्यता की लंबित कार्यवाही निष्प्रभावी नहीं हो जाती। अयोग्यता की मांग वाली याचिका पर अंतिम फैसला स्पीकर ही लेंगे। बेंच ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट को यह अधिकार है कि वह तब हस्तक्षेप करे, जब स्पीकर उचित समय के भीतर अयोग्यता याचिका पर कोई फैसला न ले पाएं।
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