सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को जम्मू-कश्मीर पुलिस के आला अधिकारियों को अवमानना के आरोपों से बरी कर दिया। साथ ही शीर्ष न्यायालय ने राज्य पुलिस की जांच के उस निष्कर्ष को भी स्वीकार कर लिया कि वर्ष 2016 में 26 साल के युवा शबीर अहमद मीर की मौत छर्रों (पैलेट) से घायल होने के कारण हुई थी। उसे बड़े विरोध प्रदर्शन के दौरान नजदीक से गोली नहीं मारी गई थी। इस बात का आरोप मृतक के पिता अब्दुल रहमान मीर ने लगाया था।
जस्टिस जे. चेलमेश्वरन और संजय किशन कौल की पीठ ने कहा कि मृतक के शरीर को खोदकर बाहर निकालने के बाद किए गए पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में पाया गया कि फायर किया गया लैड का छर्रा सामान्य शॉटगन से छोड़े गए कारतूस के अनुरूप है और सीएफएसएल की रिपोर्ट में भी स्पष्ट किया गया कि मृत शरीर से छर्रे पाए गए हैं, जो पिस्तौल के उपयोग के आरोप को खारिज करते हैं।
पीठ ने राज्य सरकार की याचिका पर लिए इस निर्णय में राज्य के पुलिस महानिदेशक और श्रीनगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के खिलाफ इस मामले में कोर्ट के आदेश के बावजूद रिपोर्ट नहीं लिखे जाने को लेकर चल रहे अवमानना के आरोपों को खारिज कर दिया और कहा कि मृतक के पिता, मां और बहन भी मजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान से मुकर चुके हैं।
अतिरिक्त सॉलिस्टिर जनरल तुषार मेहता व अधिवक्ता शोएब आलम ने इस मामले के ट्रायल कोर्ट के सामने जारी रहने की जानकारी सुप्रीम कोर्ट को दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने जम्मू-कश्मीर पुलिस को 10 जुलाई, 2016 को श्रीनगर के बाटामालू पुलिस थाना के तेंगपोरा क्षेत्र में पुलिस अधिकारियों, सीआरपीएफ व एसएसबी जवानों पर पथराव करने वालों के खिलाफ जांच जारी रखने और ट्रायल कोर्ट के समक्ष चार्ज शीट पेश करने का भी निर्देश दिया।
शबीर के पिता अब्दुल की याचिका पर श्रीनगर के चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट ने 18 जुलाई, 2016 को एसएसपी को डीएसपी यासिर कादरी व अन्य के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने के निर्देश दिए। बाद में आदेश का पालन नहीं होने पर सीजेएम ने पुलिस अधिकारियों पर अवमानना की कार्रवाई शुरू की। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने भी 4 अगस्त, 2016 को इस निर्णय को कायम रखा था।