सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को गैंगस्टर एक्ट तहत दर्ज एक मामले की सुनवाई करते हुए जांच एजेंसियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियों का काम पूरी तरह से निष्पक्ष जांच करना है और आरोपी की बेगुनाही या दोष का निर्धारण करना अदालत का काम है। शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के प्रावधानों के तहत जुलाई 2018 में इलाहाबाद में दर्ज एक प्राथमिकी से उत्पन्न आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
जस्टिस जेबी पारदीवाला व जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ विनोद बिहारी लाल की इलाहाबाद हाईकोर्ट के अप्रैल 2023 के आदेश को चुनौती वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा, हमें यह देखकर दुख हो रहा है कि जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करने का गंभीर कर्तव्य सौंपे गए अधिकारी इस तरह की लापरवाही बरत रहे हैं। यह वास्तव में लोमड़ी के मुर्गीघर की रखवाली करने जैसा मामला है। पीठ ने कहा कि आरोपपत्र की विषय-वस्तु जांच एजेंसी के लापरवाह रवैये को दर्शाती है, क्योंकि इसमें एफआईआर में बताई गई बातों से परे कुछ भी नहीं बताया गया है।
पीठ ने कहा कि यह अभी भी अस्पष्ट है कि जांच अधिकारी कैसे दावा कर सकते हैं कि अधिनियम की धारा 2 और 3 के तहत कथित अपराध अपीलकर्ता के खिलाफ साबित हैं। पीठ ने कहा, हम इस प्रथा की कड़ी निंदा करते हैं और इसे ठंडे बस्ते में डाल देते हैं, जहां जांच अधिकारी किसी अपराध को सिद्ध घोषित कर देते हैं।
ये कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग के अलावा और कुछ नहीं
पीठ ने कहा कि एफआईआर में लगाए गए अस्पष्ट और सामान्य आरोपों के मद्देनजर, अपीलकर्ता को मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर करना कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग के अलावा और कुछ नहीं होगा। ऐसे मामले में हस्तक्षेप न करने से न्याय की विफलता होगी। पीठ ने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) नियम, 2021 के प्रावधानों का हवाला दिया। नियम 17 के अनुसार सक्षम प्राधिकारी को गैंग-चार्ट भेजते समय स्वतंत्र विचार रखना चाहिए तथा यह स्पष्ट रूप से पूर्व-मुद्रित गैंग-चार्ट के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है, जिससे प्राधिकारी के लिए यंत्रवत् हस्ताक्षर करना अनुचित हो जाता है।
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