सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) को यूक्रेन व चीन से लौटे मेडिकल छात्रों के भविष्य के फैसले के लिए समाधान तलाशने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि समाधान नहीं हुआ, तो उनका कॅरिअर दांव पर लग जाएगा। परिवारों के लिए भी संकट खड़ा हो सकता है। ये छात्र देश की संपत्ति हैं।
जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस विक्रमनाथ की पीठ ने कहा कि उन्होंने सात सेमेस्टर क्लासरूम व तीन सेमेस्टर ऑनलाइन माध्यम से पूरे किए हैं। जरूरी हो, तो केंद्र सरकार समाधान खोजने के लिए विशेषज्ञ समिति बना सकती है। पीठ ने कहा कि अधिकतर छात्रों ने पाठ्यक्रम पूरा कर लिया है, पर उनका नैदानिक प्रशिक्षण नहीं हो सका। केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा, चिकित्सा पाठ्यक्रम में व्यावहारिक प्रशिक्षण का अत्यधिक महत्व है। शैक्षणिक अध्ययन उसका रूप नहीं हो सकता। छात्रों को नियमित प्रैक्टिस में शामिल नहीं करने का निर्णय स्वास्थ्य, गृह और विदेश मंत्रालय से परामर्श के बाद किया गया।
इस पर पीठ ने कहा, यह कहना उचित है कि कोर्ट के पास विशेषज्ञता नहीं है। ऐसे असंख्य हालात हैं, जो नियंत्रण से बाहर हैं जैसे कि कोविड, जो अकल्पनीय रहा है। यह एक सदी के बाद है कि मानवता को इन हालात का सामना करना पड़ा है। केंद्र ने पहले कहा था कि यूक्रेन से आए ऐसे छात्रों को भारतीय चिकित्सा संस्थानों या विश्वविद्यालयों में समायोजित नहीं किया जा सकता है, जो वहां युद्ध के कारण देश लौट आए हैं, क्योंकि यह यहां पूरी चिकित्सा शिक्षा प्रणाली को बाधित करेगा।
दस मिनट में निपटाएं जमानत याचिकाएं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों को जमानत याचिकाओं पर 10 मिनट से अधिक सुनवाई नहीं करनी चाहिए। जमानत अर्जी पर कई दिनों तक लंबी सुनवाई समय की बर्बादी है। जस्टिस संजय किशन कौल व जस्टिस एएस ओका की पीठ जेएनयू छात्र शरजील इमाम की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
शरजील ने दिल्ली दंगों की साजिश में सह-आरोपी उमर खालिद को जमानत देने से इन्कार करने के दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश में उसके खिलाफ की गई टिप्पणियों को हटाने के लिए शीर्ष कोर्ट का रुख किया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने इमाम को साजिश का प्रमुख बताया था। इमाम का कहना था, ये टिप्पणियां उन्हें सुने जाने का अवसर दिए बिना और रिकॉर्ड में मौजूद किसी सबूत के बगैर की गईं, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन है। पीठ ने कहा, ऐसी टिप्पणियां फैसले में तब आती हैं जब जमानत मामलों की लंबी सुनवाई होती है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इमाम की याचिका को स्वीकार कर लिया और आदेश दिया कि इमाम की भूमिका के संबंध में दिल्ली हाईकोर्ट की कोई भी टिप्पणी उस पर किसी भी तरह का प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी।