रिज क्षेत्र की सुरक्षा को मजबूत करने का निर्देश: सीजेआई बीआर गवई
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में दिल्ली की 'ग्रीन लंग्स' कही जाने वाली रिज क्षेत्र की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह दिल्ली रिज मैनेजमेंट बोर्ड (DRMB) को वैधानिक दर्जा दे और उसे रिज तथा मॉर्फोलॉजिकल रिज से जुड़े सभी मामलों का एकमात्र नोडल प्राधिकरण बनाए। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने यह निर्णय टीएन गोडावरमन थिरुमुलपाड़ बनाम संघ सरकार मामले में सुनाया। पीठ ने तीन मुद्दों पर विचार किया, जिनमें पहला था दिल्ली रिज को वन अधिनियम के तहत अंतिम अधिसूचना जारी करना, दूसरा रिज और मॉर्फोलॉजिकल रिज से 9 मई 1996 से जारी अतिक्रमण हटाना और तीसरा मॉर्फोलॉजिकल रिज की पहचान करना। अदालत ने कहा कि रिज की सही पहचान और संरक्षण बेहद जरूरी है, क्योंकि यह दिल्ली के लिए हरित फेफड़ों का काम करता है और प्रदूषण की वर्तमान स्थिति में इसका महत्व और बढ़ जाता है। अदालत ने टिप्पणी की कि रिज को आरक्षित वन घोषित न करने से इसे जरूरी कानूनी संरक्षण नहीं मिल पाता। इसलिए DRMB को सशक्त कानूनी दर्जा देने और रिज के संरक्षण की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है, ताकि इसकी पारिस्थितिक अखंडता बनी रहे।
क्या न्यायाधिकरण सुधारों पर 2021 का कानून वैध? सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म्स (रैशनलाइजेशन एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस) एक्ट, 2021 की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। यह कानून कई अपीलीय ट्रिब्यूनलों, जैसे फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलीय ट्रिब्यूनल, को समाप्त करता है और अलग-अलग ट्रिब्यूनलों में सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल और सेवा शर्तों में बदलाव करता है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा। एजी ने कहा कि यह कानून लंबे विचार-विमर्श के बाद संसद ने बनाया है, इसलिए इसे प्रभावी रहने दिया जाना चाहिए। अदालत ने अंतिम सुनवाई 16 अक्तूबर से शुरू की थी। सोमवार को पीठ ने पूछा कि केंद्र सरकार कैसे वही कानून दोबारा लेकर आ सकती है, जिसके कई प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट पहले ही रद्द कर चुका है, और वह भी बिना उस फैसले के मूल आधार को हटाए। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून न्यायिक स्वतंत्रता और शक्तियों को अलग-अलग करने के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। यह कानून 2021 के अध्यादेश की जगह लाया गया, जिसकी सांविधानिक वैधता को चुनौती मिली थी। बता दें कि सर्वोच्च अदालत पहले ही उस प्रावधान को रद्द कर चुकी है, जिसमें ट्रिब्यूनल सदस्यों और अध्यक्षों का कार्यकाल घटाकर चार वर्ष किया गया था। अदालत ने माना कार्यपालिका का अनुचित दखल बढ़ सकता है।