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Exclusive: आवारा कुत्तों पर 'सुप्रीम' फैसले पर पक्ष-विपक्ष के क्या तर्क, किसके दावे में कितना दम?

Wed, 13 Aug 2025 05:48 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में आवारा कुत्तों के प्रबंधन के लिए फैसला दिया है। जिसे लेकर पशु प्रेमी और उनसे परेशान होने वाले लोग आमने-सामने हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पेटा से लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी, भाजपा नेता मेनका गांधी, प्रियंका चतुर्वेदी समेत नेताओं ने भी टिप्पणी की है। इसके अलावा कई बॉलीवुड सेलिब्रिटीज ने भी इस सवाल उठाए हैं और सरकार से दखल देने की मांग भी की है। पढ़ें इस मुद्दें पर विशेष चर्चा...
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आवारा कुत्तों पर 'सुप्रीम' फैसले पर पक्ष-विपक्ष के तर्क - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट की तरफ से हाल ही में एक बड़ा फैसला दिया गया है स्ट्रे डॉग्स यानी आवारा कुत्तों को लेकर जिसमें कोर्ट की तरफ से ये कहा गया कि जो आवारा कुत्ते हैं, उन्हें शेल्टर होम्स में रखा जाए और खुले में ना छोड़ा जाए। हाालिया दिनों में जिस तरह की घटनाएं आवारा कुत्तों के हमलों के लेकर सामने आई हैं उसे देखते हुए और संसद के अंदर इसे लेकर पशुपालन राज्य मंत्री ने रिपोर्ट भी पेश की थी। वहीं इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया और इस पर ये फैसला दिया गया कि ये सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ये कुत्ते जिन्हें सड़क से हटाया जाएगा और शेल्टर होम्स में इन्हें रखने की व्ययवस्था की जाए और ये वापस से दोबारा सड़क पर ना आएं।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अलग-अलग प्रतिक्रिया
वहीं सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद इस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रहे हैं, कुछ लोग इसका समर्थन कर रहे हैं वो कह रहे हैं कि इससे सुरक्षा सुनिश्चित होगी। वहीं कुछ लोग कुत्तों के हटाए जाने का विरोध कर रहे हैं। विरोध करने वालों की तरफ से यह कहा जा रहे हैं कि किसी एक या इस तरीकी घटनाओं के सामने आने की वजह से सभी कुत्तों को सजा दी जा रही है। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता रुद्र विक्रम सिंह और सामाजिक कार्यकर्ता जोगिंदर सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता विभा चुग और सामाजिक कार्यकर्ता संजय महापात्रा ने अपनी अपनी राय रखी है।

  • सवाल- सुप्रीम कोर्ट की तरफ से दिए फैसले में क्या दिक्कत है?
  • विभा चुग- आवारा कुत्ते शुरू से ही हमारी सभ्यता का हिस्सा रहे हैं। हम सनातनी है, हमने सीखा है पहली रोटी गाय को और आखिरी रोटी कुत्ते की दी जाती है। आज तक रेबीज के केस नहीं थे, एकदम अचानक से इसमें बढ़ोत्तरी कैसे हुई और कुत्ता, कुत्ता, कुत्ता किस लिए ये किया जा रहा है। हमारी लड़ाई डॉग हेटर्स से नहीं है, हम अपने कुत्तों के समर्थन में हैं। हम रेबीज को सपोर्ट नहीं करते, जैसे 500 कुत्तों को एंटी रेबीज वैक्सीन हमारी संस्था हर साल लगाती है। आज तक सरकार ने इस मामले में क्या किया, ये सरकार की सबसे बड़ी विफलता है। सरकार एंटी रेबीज और उन्हें स्टलाइज कराने के लिए कोई धनराशि नहीं उपलब्ध कराती है। मेरा सवाल ये है कि पांच लाख कुत्तों को एक जगह लाकर बंद कर दिया जाए, तो सरकार के पास ऐसे किसी शेल्टर की व्यवस्था नहीं है। सरकारी खर्चे पर एक शेल्टर होम संचालित नहीं किया जा पा रहा तो पांच लाख कुत्तों को पालने की वो तो सिर्फ दिल्ली में हैं ये कैसे संभव है? 
 
  • विभा चुग आगे कहती हैं कि NCR में जाकर देखिए एक डॉग लवर से पूछिये वो कैसे अपना पेट काट-काट के इन कुत्तों को रोज खाना खिलाने जाता है इन्हें रेबीज की वैक्सीनेशन दिलवाता है इन्हें स्टरलाइज कराता है। जो सरकार का काम है वो हम कर रहे हैं क्या सरकार के पास लाखों करोड़ हैं? क्या हमारे देश के बाकी मुद्दे खत्म हो गए हैं? बच्चियों के दुष्कर्म पर कोई सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान नहीं लिया, कूड़े के पहाड़ बनते जा रहे हैं हम उसकी तरफ नहीं देखते हैं, बेरोजगारी अपने चरम पर जा रही है और कुछ लोग बस कुत्ता-कुत्ता कर रहे हैं। हम आंकड़ों की तरफ नहीं देखते हैं क्योंकि हम रैशनल नहीं सोचना चाहते हैं अगर आप आंकड़े देखें रेबीज से कितने केस हुए? पिछले साल में सड़क हादसे में कितनी मौतें हुई हैं? तो क्या सारी कारें आप सड़कों पर चलाना बंद कर देंगे? आपको कुत्तों को सिर्फ रेबीज के इंजेक्शन देने हैं और स्टरलाइज करवाइए। जब हम यहां पर आकर बोलते हैं या सोशल मीडिया के अलग-अलग माध्यम से हम अपनी आवाज उठाते हैं तो डॉग हेटर हम निशाना बनाते हैं। हम सभी एक ही समाज में रहते हैं हमारी लड़ाई इनसे नहीं है हम समझते हैं कि रेबीज जैसा रोग समाज में नहीं होना चाहिए। लेकिन आप भी हमें समझें आप इसको एक पलीटिकल मुद्दा ना बनाएं। कल आपने देखा होगा राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, सब उतर आएं। लेकिन हमें अपनी मोदी सरकार पर पूरा भरोसा है। हम इस मुद्दे को राजनीतिक रंग नहीं देना चाहते हैं।

सवाल- आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं, जोगिंदर सिंह जी आप लोग सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का समर्थन क्यों कर रहे हैं?
जोगिंदर सिंह- सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विरोध कर रहे एनजीओ या वे लोग जो आवारा कुत्तों को रखना चाहते हैं और वे ये जान लें कि इस आदेश का कुत्तों से कुछ भी लेना देना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कुत्तों का जिक्र जरूर किया गया है लेकिन ये आदेश हमारे मौलिक अधिकार को लेकर हैं। एक इंसान जो सुरक्षित जीवन जिये उसके ऊपर है ये आदेश। कोर्ट ने वही बात की है जो हमारा संविधान कहता है। जब से ये आदेश हुआ हिंदुस्तान में कोई भी सामने नहीं लेकर आया ये बड़ी गहरी चीज है। मैं बताना चाहरा हूं ये जो आदेश है मानवाधिकारों की रक्षा करने के लिए हुआ है। मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा था और मानवाधिकारों का उल्लंघन एबीसी रूल 23 भी कर रहा था, जिसके ऊपर कोर्ट ने भी बकायदा टिप्पणी की है। ये जो कानून बन गया कि जो कुत्ता काटता है उसको आपने स्टेरलाइज किया और उसने वापस वही छोड़ना है। ये जो टिप्पणी की गई इस ऐसे नहीं कह दिया गया। जज साहब ने कहा है कि उन कुत्तो को वापस किसी शेल्टर होम में होना चाहिए ना कि खुले में होना चाहिए क्योंकि वो एक बार किसी इंसान को हानि पहुंचा चुका है। अगर एबीसी रूल की बात करें तो एबीसी रूल कोई कानून नहीं है। पशु क्रूरता अधिनियम कानून है जो ये कहता है कि आवारा कुत्ते नाम की कुछ चीज होगी ही नहीं। कानून के अनुसार कुत्ते होंगे तो पालतू होंगे कोई भी जानवर अवारा नहीं हो सकता ये पहला इंसानियत का सिद्धांत है किसी भी कुत्ते या जानवर को आपने सड़कों पर छोड़ दिया कभी उसको खाना मिल रहा है कभी नहीं मिल रहा है, कभी वो भूखा है कभी बारिश में है, कभी धूप में है, ये बहुत बड़ा अत्याचार है।

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सवाल- रूद्र विक्रम सिंह जी जब कोर्ट ने साफ-साफ शब्दों में ये कहा कि इनके लिए व्यवस्था होनी चाहिए, शेल्टर होने चाहिए, इसकी मॉनिटरिंग की जाए तो इसमें दिक्कत क्या है?  
रूद्र विक्रम सिंह - आज हिंदुस्तान के लिए सबसे बुरा दिन है कि आज हम कुत्ते को लेकर बहस कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया, जिसमें सभी चीजों का ध्यान रखा गया है। उसके बावजूद ये हल्ला और कोर्ट के फैसले को नहीं माना जा रहा है। मुझे ये लगता है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट को एक और व्यवस्था कर देना चाहिए कि जितने भी ये डॉग लवर्स हैं वे आवारा कुत्तों के घर ले जाएं, लेकिन अगर उन कुत्तों ने किसी को काटा तो हत्या के प्रयास का मामला दर्ज होना चाहिए। फिर सभी अपने आप सभी सही हो जाएंगे। आप रेबीज के किसी मरीज को देख लिजिए आपका जो कुत्ता प्रेम है न वहीं खत्म हो जाएगा। मैं तो आरएमएल हॉस्पिटल में एक मेरे डॉक्टर हैं मैं उनसे मिला हूं उन्होंने एक रेबीज के बच्चे का छह साल तक इलाज किया, इसके बावजूद भी वो बच्चा ऐसी स्थिति में है कि उसकी मां उसे बस देखकर ही जीवन जी सकेगी। क्योंकि रेबीज के मरीज को जंजीरों में बांध कर रखना पड़ा है। आज इस पर बहस हो रही है, मुझे समझ नहीं आ रहा आपको अपने लोगों से प्रेम नहीं है जो इंसान है उनसे प्रेम नहीं है और एक ऐसे जीव से प्रेम है जो आपके लिए हानिकारक हैं। ये किस तरह की निकृष्ट सोच है। 

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सवाल - संजय महापात्रा जी, सवाल ये है कि ऐसी स्थिति आ गई कि इस विषय पर चर्चा करना पड़ रहा है और सुप्रीम कोर्ट को फैसला देना पड़ रहा है और कानून होने के बाद भी फैसला देना पड़ा है आखिर दिक्कत कहा है?
संजय महापात्रा - मैं कहूंगा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूरी तरह एकतरफा है और आंख बंद करके दिया गया है। जिस केस पर ये फैसला आया है, उस केस में रेबीज से मौत का प्रमाण भी नहीं है। हम दिल्ली की बात करते हैं दिल्ली तीन से चार लाख कुत्ते हैं, इन्हें हटाया जाएगा। 200 कुत्तों को रखने के लिए एक एकड़ जमीन चाहिए। ऐसे चार लाख कुत्तों को रखने के लिए चार हजार एकड़ जमीन और डेढ़ लाख लोग और पशु वाहन के साथ-साथ खाना पानी चाहिए। क्या इस सबका इंतजाम हो पाएगा? हम इस फैसले का विरोध करते हैं और आखिरी दम तक करेंगे और सुप्रीम कोर्ट से मांग कर रहे हैं कि अपने फैसले पर पुनर्विचार करे। इसके साथ ही हम प्रधानमंत्री से मांग कर रहे हैं कि वो इसमें दखल दें। अगर ये बहुत बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाएगा तो इससे विपक्ष को फायदा मिलेगा सरकार को फायदा नहीं होगा। क्या आपको लग रहे है जो कुत्ता बोल नहीं पाते उसके खिलाफ जो फैसले दिए जा रहे हैं क्या उनको सही तरीके से खाना पानी मिलेगा? अगर हम सोसाइटीज से सभी कुत्तों को हटा देते हैं तो क्या आपको नहीं लगता कि यहां चूहों की संख्या बढ़ जाएंगी? बिल्लियों की संख्या बढ़ जाएंगी? फिर क्या आप हमें रेबीज से बचाएंगे?
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क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
सर्वोच्च न्यायालय ने आवारा कुत्तों के काटने से जुड़े केसों का संज्ञान लेते हुए आदेश दिया कि देश की राजधानी और इसके आसपास मौजूद शहरों से छह से आठ हफ्ते के अंदर सभी आवारा कुत्तों को गलियों से हटाया जाए। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने आवारा कुत्तों की वजह से पैदा हो रही समस्याओं को जबरदस्त खतरा बताया और कहा कि नवजातों और छोटे बच्चों को किसी भी कीमत पर आवारा कुत्तों के काटने और रेबीज के खतरे से दूर रखना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने एक हेल्पलाइन स्थापित करने के भी निर्देश दिए। इस हेल्पलाइन पर लोग कुत्तों के काटने की घटनाओं को रिपोर्ट कर सकेंगे। अदालत ने आवारा कुत्तों के खिलाफ कार्रवाई में बाधा डालने वालों पर भी सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए।

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