सवाल- आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं, जोगिंदर सिंह जी आप लोग सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का समर्थन क्यों कर रहे हैं?
जोगिंदर सिंह- सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विरोध कर रहे एनजीओ या वे लोग जो आवारा कुत्तों को रखना चाहते हैं और वे ये जान लें कि इस आदेश का कुत्तों से कुछ भी लेना देना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कुत्तों का जिक्र जरूर किया गया है लेकिन ये आदेश हमारे मौलिक अधिकार को लेकर हैं। एक इंसान जो सुरक्षित जीवन जिये उसके ऊपर है ये आदेश। कोर्ट ने वही बात की है जो हमारा संविधान कहता है। जब से ये आदेश हुआ हिंदुस्तान में कोई भी सामने नहीं लेकर आया ये बड़ी गहरी चीज है। मैं बताना चाहरा हूं ये जो आदेश है मानवाधिकारों की रक्षा करने के लिए हुआ है। मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा था और मानवाधिकारों का उल्लंघन एबीसी रूल 23 भी कर रहा था, जिसके ऊपर कोर्ट ने भी बकायदा टिप्पणी की है। ये जो कानून बन गया कि जो कुत्ता काटता है उसको आपने स्टेरलाइज किया और उसने वापस वही छोड़ना है। ये जो टिप्पणी की गई इस ऐसे नहीं कह दिया गया। जज साहब ने कहा है कि उन कुत्तो को वापस किसी शेल्टर होम में होना चाहिए ना कि खुले में होना चाहिए क्योंकि वो एक बार किसी इंसान को हानि पहुंचा चुका है। अगर एबीसी रूल की बात करें तो एबीसी रूल कोई कानून नहीं है। पशु क्रूरता अधिनियम कानून है जो ये कहता है कि आवारा कुत्ते नाम की कुछ चीज होगी ही नहीं। कानून के अनुसार कुत्ते होंगे तो पालतू होंगे कोई भी जानवर अवारा नहीं हो सकता ये पहला इंसानियत का सिद्धांत है किसी भी कुत्ते या जानवर को आपने सड़कों पर छोड़ दिया कभी उसको खाना मिल रहा है कभी नहीं मिल रहा है, कभी वो भूखा है कभी बारिश में है, कभी धूप में है, ये बहुत बड़ा अत्याचार है।
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सवाल- रूद्र विक्रम सिंह जी जब कोर्ट ने साफ-साफ शब्दों में ये कहा कि इनके लिए व्यवस्था होनी चाहिए, शेल्टर होने चाहिए, इसकी मॉनिटरिंग की जाए तो इसमें दिक्कत क्या है?
रूद्र विक्रम सिंह - आज हिंदुस्तान के लिए सबसे बुरा दिन है कि आज हम कुत्ते को लेकर बहस कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया, जिसमें सभी चीजों का ध्यान रखा गया है। उसके बावजूद ये हल्ला और कोर्ट के फैसले को नहीं माना जा रहा है। मुझे ये लगता है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट को एक और व्यवस्था कर देना चाहिए कि जितने भी ये डॉग लवर्स हैं वे आवारा कुत्तों के घर ले जाएं, लेकिन अगर उन कुत्तों ने किसी को काटा तो हत्या के प्रयास का मामला दर्ज होना चाहिए। फिर सभी अपने आप सभी सही हो जाएंगे। आप रेबीज के किसी मरीज को देख लिजिए आपका जो कुत्ता प्रेम है न वहीं खत्म हो जाएगा। मैं तो आरएमएल हॉस्पिटल में एक मेरे डॉक्टर हैं मैं उनसे मिला हूं उन्होंने एक रेबीज के बच्चे का छह साल तक इलाज किया, इसके बावजूद भी वो बच्चा ऐसी स्थिति में है कि उसकी मां उसे बस देखकर ही जीवन जी सकेगी। क्योंकि रेबीज के मरीज को जंजीरों में बांध कर रखना पड़ा है। आज इस पर बहस हो रही है, मुझे समझ नहीं आ रहा आपको अपने लोगों से प्रेम नहीं है जो इंसान है उनसे प्रेम नहीं है और एक ऐसे जीव से प्रेम है जो आपके लिए हानिकारक हैं। ये किस तरह की निकृष्ट सोच है।
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क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
सर्वोच्च न्यायालय ने आवारा कुत्तों के काटने से जुड़े केसों का संज्ञान लेते हुए आदेश दिया कि देश की राजधानी और इसके आसपास मौजूद शहरों से छह से आठ हफ्ते के अंदर सभी आवारा कुत्तों को गलियों से हटाया जाए। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने आवारा कुत्तों की वजह से पैदा हो रही समस्याओं को जबरदस्त खतरा बताया और कहा कि नवजातों और छोटे बच्चों को किसी भी कीमत पर आवारा कुत्तों के काटने और रेबीज के खतरे से दूर रखना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने एक हेल्पलाइन स्थापित करने के भी निर्देश दिए। इस हेल्पलाइन पर लोग कुत्तों के काटने की घटनाओं को रिपोर्ट कर सकेंगे। अदालत ने आवारा कुत्तों के खिलाफ कार्रवाई में बाधा डालने वालों पर भी सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए।