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इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई मुहर, कहा- इज्जत से मरना इंसान का हक

Fri, 09 Mar 2018 03:10 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि गरिमा के साथ मौत एक मौलिक अधिकार है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने निष्क्रिय इच्छा मृत्यु और लिविंग विल को कानूनन वैध ठहराया है। इस संबंध में अदालत ने विस्तृत दिशानिर्देश भी जारी करते हुए कहा है कि जब तक सरकार इस संबंध में कानून नहीं बना देती, तब तक ये दिशानिर्देश लागू रहेंगे।

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चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में पांच जजों की संविधान पीठ ने 2005 में कॉमन कॉज नामक एनजीओ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। याची की ओर से पेश मशहूर अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी थी कि मेडिकल एक्सपर्ट की राय में मरीज के ठीक होने की संभावना खत्म हो चुकी हो तो उसे जीवन रक्षक प्रणाली से हटाने की अनुमति दी जानी चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो उसकी यंत्रणा बढ़ती ही जाएगी। सरकार ने भी निष्क्रिय इच्छा मृत्यु का समर्थन किया। याची और सरकार की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने पिछले साल 11 अक्तूबर में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने 42 साल तक कॉमा में रही अरुणा शानबाग के मामले में सुनवाई करते हुए इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी थी, लेकिन इसके संबंध में कोई कानूनी प्रावधान न होने के कारण स्थिति स्पष्ट नहीं हुई थी। ताजा फैसले में गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 में शामिल कर लिया गया है, जो हर नागरिक को जीने का अधिकार देता है।
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क्या है लिविंग विल

supreme court
क्या है लिविंग विल
यह एक लिखित दस्तावेज होता है जिसमें कोई मरीज पहले ही इस बात की घोषणा कर सकता है कि अगर वह ठीक न होने की हालत में पहुंच जाए या अपनी इच्छा जाहिर करने की स्थिति में न हो तो उसे कैसा मेडिकल ट्रीटमेंट दिया जाए। इसके तहत वह अपने परिजनों को जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने का अधिकार दे सकता है। 

केंद्र सरकार का विरोध
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने लिविंग विल का यह कहते हुए विरोध किया था कि इसका दुरुपयोग हो सकता है। केंद्र ने यह भी सूचित किया कि वह इस संबंध में एक विधेयक भी तैयार कर लिया है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सरकार पर छोड़ने के बजाय इस बारे में विस्तृत दिशानिर्देश जारी कर दिए। इसके अनुसार इन परिस्थितियों में निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की अनुमति होगी:
- अगर मरीज खुद यह इच्छा व्यक्त करता है कि उसकी जीवन रक्षक प्रणाली हटा ली जाए
- मरीज ने पहले से ही लिविंग विल तैयार कर ली हो
- मरीज अपनी इच्छा जाहिर करने की स्थिति में न हो तो मेडिकल बोर्ड की राय से परिजन कर सकते हैं फैसला

सक्रिय इच्छा मृत्यु की इजाजत नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सक्रिय इच्छा मृत्यु गैर कानूनी है इसलिए इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती है। निष्क्रिय इच्छा मृत्यु में मरीज का इलाज बंद कर दिया जाता है जबकि सक्रिय इच्छा मृत्यु में उसके कहने पर उसे मरने की दवा दी जाती है या इंजेक्शन दिया जाता है।
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