मराठा आरक्षण मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए राज्यों को और अधिक कदम उठाने चाहिए। साथ ही सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए संस्थानों की स्थापना करनी चाहिए क्योंकि सकारात्मक कार्रवाई सिर्फ आरक्षण तक सीमित नहीं है।
जस्टिस अशोक भूषण की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा, राज्य सरकार द्वारा पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए कई अन्य कदम भी उठाए जा सकते हैं। हम कुछ और क्यों नहीं कर सकते, हमें आरक्षण से आगे जाना होगा।
पीठ में जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस ए अब्दुल नजीर, जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस एस रवींद्र भट्ट भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान झारखंड सरकार की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा, इस तरह की पहल के लिए राज्य के वाणिज्यिक संसाधन भी मुद्दा बनेंगे। इनके अलावा शिक्षकों व स्कूलों की संख्या भी आड़े आएगी।
सिब्बल ने कहा, राज्यों की आबादी के आधार पर आरक्षण की पहुंच अलग-अलग होगी। इसलिए एक समान फार्मूला नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट शिक्षा और नौकरियों में मराठा आरक्षण के लिए 2018 में आए महाराष्ट्र के उस कानून की वैद्यता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। शीर्ष कोर्ट साथ ही 1992 के इंदिरा सहानी मामले के उस फैसले में शामिल मुद्दों पर भी विचार कर रहा है जिसमें आरक्षण को 50 फीसदी तक की सीमा लगाई गई है।