सबरीमाला मंदिर में रजोधर्म आयुवर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिन्दू धर्म पुरुष और महिलाओं में बिभेद नहीं करता। शीर्ष अदालत ने यह कहते हुए हिन्दू-हिन्दू होता है, चाहें वह महिला हो या पुरुष। ऐसे में पुरुषों को मंदिर में जाने की इजाजत क्यों और महिलाओं को क्यों नहीं?
महिलाओं की शक्ति और अहमियता का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि भगवान शिव बिना शक्ति के एक कदम नहीं चल सकते और उनकी शक्ति पार्वती है। यह महिला शक्ति को दर्शाता है।
पीठ ने यह भी कहा कि हम इस बात पर नहीं जाना चाहते हैं कि सबरीमाला मंदिर में भगवान को ब्रहमचारी रूप में पूजा जाता है और वह नहीं चाहते कि 10 से 50 आयुवर्ग की महिलाएं उनके पास आएं। लेकिन हमें यह देखना होगा कि यह संविधान की कसौटी पर कितना खरा उतरता है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि सबरीमाला मंदिर प्रबंधन ने अपनी एक परंपरा बनाई है क्योंकि भगवान, जो ब्रहमचारी हैं, उनकी पवित्रता बनी रहें। हम इस बात पर परीक्षण करना चाहते हैं कि कोई भी परम्परा संवैधानिक मापदंडों पर कितना खरा उतरता है?
वहीं मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी केखिलाफ अपनी दलीलें पेश करते हुए वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि कोई भी धार्मिक मान्यता या परंपरा संविधान से बड़ा नहीं हो सकता। संविधान में महिलाओं और पुरुषों में कोई विभेद नहीं है। वहीं सुनवाई के दौरान वकील ने यह भी गुहार की कि इस मामले में संविधान पहलू हैं, लिहाजा मामले को संविधान पीठ केपास भेज दिया जाना चाहिए। इस पर पीठ ने कहा कि अभी इसकी दरकार नहीं नजर आ रही। पीठ ने कहा कि जब कभी भी हमें ऐसा लगेगा तो इस पर विचार किया जाएगा।
शीर्ष अदालत यंग लॉयर्स एसोसिएशन समेत अन्य द्वारा दाखिल जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। याचिका में कहा गया कि सबरीमाला मंदिर में उन लड़कियों के प्रवेश पर पाबंदी है जिनका मासिक धर्म शुरू हो चुका है। हालांकि उन महिलाओं की मंदिर में प्रवेश की इजाजत है जो रजोनिवृति हो।