सार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि हाईकोर्ट, जो संविधानिक अदालतें हैं और समानता व निष्पक्षता बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाती हैं, उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने प्रशासनिक कामकाज में भी इन सिद्धांतों को अपनाएं और एक एक 'मॉडल एम्प्लॉयर यानी आदर्श नियोक्ता के मानकों पर खरे उतरें।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि हाईकोर्ट केवल न्याय देने वाली सांविधानिक संस्थाएं ही नहीं हैं, उन्हें अपने प्रशासनिक कामकाज में भी समानता और निष्पक्षता के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। हाईकोर्ट से यह अपेक्षा की जाती है कि वे एक आदर्श नियोक्ता के रूप में व्यवहार करें।
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाते हुए की। मामला कुछ कर्मचारियों की सेवाओं को नियमित न किए जाने से जुड़ा था। ये कर्मचारी ऑपरेटर-कम-डाटा एंट्री असिस्टेंट और रुटीन ग्रेड क्लर्क के पदों पर काम कर रहे थे। अदालत ने पाया कि समान स्थिति में काम करने वाले अन्य कर्मचारियों को नियमित किया गया, लेकिन इनको बिना ठोस कारण के वंचित कर दिया गया।
जस्टिस जेके महेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि एक ही संस्थान में समान काम करने वाले कर्मचारियों के साथ अलग-अलग व्यवहार से संविधान में दिए समानता व निष्पक्षता के सिद्धांत कमजोर होते हैं। अदालत ने कहा कि ऐसा व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14, 16 व 21 के खिलाफ है, जो कानून के सामने समानता, नौकरी में समान अवसर और जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि जिन कर्मचारियों की सेवाएं पहले समाप्त कर दी गई थीं, उन्हें उसी पद पर दोबारा बहाल किया जाए, जिस पर वे काम कर रहे थे। अदालत ने यह भी कहा कि उनकी नियुक्ति की तारीख से एक साल पूरा होने के बाद उनकी सेवाओं को नियमित किया जाए।
आदेश के पालन के लिए आठ सप्ताह का दिया समय
अदालत ने निर्देश दिया कि जिस समय के दौरान ये कर्मचारी नौकरी से बाहर रहे, उस अवधि का वेतन छोड़कर उन्हें सभी लाभ दिए जाएं। इनमें वरिष्ठता, पदोन्नति, वेतन निर्धारण, वेतनवृद्धि और सेवानिवृत्ति से जुड़े लाभ शामिल होंगे, यदि वे लागू हों। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन को आदेशों का पालन आठ सप्ताह में करने को कहा है। हालांकि, अदालत ने साफ किया कि यह फैसला केवल इसी मामले के तथ्यों पर आधारित है और इसे भविष्य के मामलों में मिसाल के तौर पर नहीं माना जाएगा।
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शीर्ष अदालत ने यह भी बताया कि हाई कोर्ट प्रशासन की ओर से यह दलील दी गई थी कि नियमितीकरण कोई अधिकार नहीं है और रूटीन ग्रेड क्लर्क का पद अब समाप्त हो चुका है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समान स्थिति वाले कर्मचारियों के बीच किया गया भेदभाव किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता और इसे खत्म किया जाना जरूरी है।