मराठा आरक्षण मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि अगर यह तर्क सही है कि संविधान के 102वें संशोधन के बाद संसद ही एसईबीसी की सूची जारी कर सकती है, तो मराठाओं को आरक्षण देने वाला महाराष्ट्र का कानून पारित ही नहीं हो सकता। क्योंकि ऐसा करना विधायी क्षमताओं के परे है।
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान संशोधन के तर्क पर की टिप्पणी
जस्टिस अशोक भूषण के नेतृत्व वाली पांच सदस्यीय पीठ को मराठा आरक्षण को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता ने बताया कि संविधान में संशोधन के बाद सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग को सिफ राष्ट्रपति ही निर्धारित कर सकते हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने पीठ को बताया कि संशोधन के बाद अगर संविधान में मराठाओं को आरक्षण देने का रास्ता नहीं निकलता है तो राज्य सरकार खुद से इसके लिए कानून नहीं बना सकते।
उन्होंने दलील दी कि संविधान संशोधन के बाद महाराष्ट्र सरकार ने एक आयोग का गठन कर एसईबीसी सूची में मराठा समुदाय को जबरन शामिल किया। उन्होंने कहा, यह जांच का विषय है कि क्या महाराष्ट्र सरकार को ऐसा करने की अनुमति है।
शंकरनारायणन ने दिनभर चली सुनवाई में 1992 के इंदिरा साहनी केस का हवाला भी दिया जिसमें कोर्ट ने अन्य पिछड़ी जातियों को एससी-एसटी के साथ दर्जा देने के विचार को खारिज कर दिया था। याचिकाकर्ता के वकील की इन दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने पाया कि अगर यह तर्क सही है तो महाराष्ट्र के इस कानून को मान्यता नहीं दी जा सकती।