सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकारी आदेश या नियम के जरिये दोषी की समय से पहले रिहाई के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (हीबस कॉर्पस) अर्जी का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। दरअसल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश कर यह सुनिश्चित किया जाता है कि उस व्यक्ति की हिरासत वैध है या अवैध।
जस्टिस एसए नजीर और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने स्पष्ट किया कि हीबस कॉर्पस याचिका तभी दी जा सकती है, जब किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समय के साथ इसके दायरे को व्यापक बनाया गया।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर फैसला सुनाया है, जिसमें तमिलनाडु सरकार द्वारा एमजी रामचंद्रन की जन्मशती पर कैदियों की समय पूर्व रिहाई की योजना को सही ठहराया था। पीठ ने कहा, यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि हीबस कॉर्पस ऐसे मामलों के लिए एक उपाय है, जिसमें व्यक्ति की व्यक्तिगत आजादी का हनन होता हो।