सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की सहकारी समितियों और अन्य सरकारी अनुदानप्राप्त संस्थाओं में जिला अधिकारियों की पत्नियों को पदेन पदाधिकारी बनाए जाने की परंपरा को औपनिवेशिक मानसिकता करार दिया और इसके लिए राज्य सरकार को फटकार लगाई। इस परंपरा को आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के विपरीत बताते हुए शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को दो महीने के भीतर संबंधित कानूनों को संबोधित करने का निर्देश दिया।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ बुलंदशहर की सीएम जिला महिला समिति की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। समिति ने जिला अधिकारी की पत्नी को पदेन अध्यक्ष बनाने की प्रथा को चुनौती देते हुए कहा था कि समिति का गठन निर्धन और वंचित महिलाओं की सहायता के लिए हुआ था लेकिन इसे मनमाने ढंग से चलाया जा रहा है और जवाबदेही का अभाव है।
डीएम की पत्नी स्वत: अध्यक्ष कैसे?
सुनवाई के दौरान पीठ ने पूछा, जिला अधिकारी की पत्नी को किसी समिति का अध्यक्ष स्वतः कैसे बनाया जा सकता है? लोकतंत्र में पदों पर चयन चुनाव से होना चाहिए न कि अधिकारी के रिश्ते से। अदालत ने कहा कि कई समितियों के उपनियम आज भी जिला अधिकारियों, मुख्य सचिवों और अन्य शीर्ष अफसरों की पत्नियों को अध्यक्ष जैसे पद स्वतः दे देते हैं, जो इस बात का संकेत है कि औपनिवेशिक काल की मानसिकता अब भी शासन तंत्र में जीवित है।
यूपी सरकार बोली, नया विधेयक बना रहे
पीठ ने टिप्पणी की कि यह व्यवस्था ऐसे प्रतीत होती है जैसे सत्ता कलेक्टर की पत्नी के हाथों में धूल झाड़कर सौंप दी गई हो। यह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि 1860 के पंजीकरण अधिनियम को बदलने के लिए नया विधेयक तैयार किया जा रहा है। राज्य सरकार ने इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए जनवरी तक का समय मांगा। सरकार ने कहा कि नए कानून में ऐसी सभी औपनिवेशिक प्रथाओं को समाप्त कर दिया जाएगा।
कोर्ट की सख्त टिप्पणियां
- पदेन नियुक्ति की परंपरा औपनिवेशिक मानसिकता, यूपी सरकार को फटकार
- सरकार को निर्देश- दो महीने के भीतर नियम को संबोधित करें
पारित होते ही बिल को अधिसूचित करें
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि जैसे ही विधानसभा विधेयक को पारित करे, उसे बिना देरी के अधिसूचित किया जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य को सभी सरकारी अनुदान-प्राप्त संस्थाओं, समितियों और ट्रस्टों के लिए मॉडल उपनियम तैयार करने होंगे। पीठ ने कहा कि अगर कोई संस्था मॉडल उपनियमों का पालन नहीं करती है तो राज्य सरकार उसके कानूनी दर्जे पर पुनर्विचार कर सकती है या उसका सरकारी सहयोग रोक सकती है।
समिति अमान्य नहीं होगी
अदालत ने कहा कि शासन संरचनाएं लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रतिबिम्बित करें और अधिकतर पदाधिकारी निर्वाचित हों, यही लोकतंत्र का मूल आधार है। हालांकि बुलंदशहर समिति के उपनियम और चुनाव पहले ही निरस्त कर दिए गए हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि समिति को अमान्य नहीं किया जाएगा। नया कानूनी ढांचा लागू होने तक एक अंतरिम निकाय वैधानिक कार्य करता रहेगा।