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सुप्रीम कोर्ट: केंद्र सरकार ने बताया- कोविड-19 वैक्सीन परीक्षण डेटा का खुलासा राष्ट्रीय हित के खिलाफ

Mon, 29 Nov 2021 08:59 PM IST
अभिषेक दीक्षित राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में यह स्पष्ट कर दिया था कि याचिका की सुनवाई का मतलब यह नहीं माना जाना चाहिए कि कोर्ट को कोविड-19 टीकों के प्रभाव पर भरोसा नहीं है। हालांकि कोर्ट ने केंद्र को इस संबंध में अपना पक्ष रखने के लिए कहा था।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : Social Media
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विस्तार
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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि नागरिकों के जबरन टीकाकरण का आरोप लगाने और कोविड-19 वैक्सीन परीक्षण डेटा का खुलासा करने की मांग करने वाली याचिका राष्ट्रीय हित के खिलाफ है और नागरिकों के टीकाकरण के अधिकारों का उल्लंघन है।

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सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने हलफनामे दायर कर कहा है कि टीकाकरण पर राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह के पूर्व सदस्य डॉ जैकब पुलियेल द्वारा दायर याचिका सीधे तौर पर जनहित को नुकसान पहुंचाती है।

केंद्र ने कहा है, 'इस समय केंद्र सरकार और राज्य सरकारों का पूरा ध्यान टीकाकरण अभियान पर होना चाहिए और लोगों को टीकाकरण के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इसलिए इस समय कुछ लोगों के पीछे के उद्देश्यों का पता लगाने में समय लगाना वांछनीय नहीं है।
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केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा कि टीकाकरण के खिलाफ किसी भी तरह की गलतफहमी, गलत संदेह व प्रेरित प्रचार से वैक्सीन के प्रति हिचकिचाहट बढ़ने का संभावित खतरा हो सकता है, जो जनहित में नहीं होगा। हकफनामे में कहा गया है कि टीकों के परीक्षण और अनुमोदन के लिए एक वैधानिक व्यवस्था है और इसका पालन किया गया है।

केंद्र ने कहा है कि सभी टीकाकरण परीक्षण डेटा सार्वजनिक रूप से मौजूद है। सिर्फ वह डेटा सार्वजनिक नहीं है जो क्लीनिकल ट्रायल के प्रतिभागियों के बारे में किसी भी जानकारी को उजागर करता है क्योंकि ऐसा करना नियमों और दिशानिर्देशों के विरुद्ध है। केंद्र ने कहा है कि याचिकाकर्ता को बताए गए तथ्यों के बारे में पूरी तरह से पता है। याचिकाकर्ता ने न्यायालय के समक्ष एक झूठी तस्वीर पेश करते की कोशिश की है। केंद्र ने याचिका को खारिज करने की मांग करते हुए कहा है कि राष्ट्र इस समय मानव जाति के सामने उत्पन्न एक अभूतपूर्व त्रासदी का सामना कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में यह स्पष्ट कर दिया था कि याचिका की सुनवाई का मतलब यह नहीं माना जाना चाहिए कि कोर्ट को कोविड-19 टीकों के प्रभाव पर भरोसा नहीं है। हालांकि कोर्ट ने केंद्र को इस संबंध में अपना पक्ष रखने के लिए कहा था।

कोर्ट ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों से मांगा जवाब

वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य मामले में कोरोना से मौत पर मुआवजे का दावा करने वाले पीड़ितों की कम संख्या पर चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने राज्यों से पूछा कि उन्होंने इस योजना के बारे में ठीक तरह से प्रचार-प्रसार किया गया है या नहीं। जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को कोरोना से दर्ज की मौतों, मुआवजे के लिए अब तक मिले आवेदन और उन लोगों की संख्या बताने के निर्देश दिए हैं, जिन्हें अब तक मुआवजे का भुगतान किया जा चुका है।

पीठ ने कहा कि सभी सूचनाएं राज्यों द्वारा केंद्रीय गृह मंत्रालय, केंद्र सरकार, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एजेंसी को तीन दिसंबर या उससे पहले मुहैया करा दी जाएं। मामले में अगली सुनवाई छह दिसंबर को होगी।
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शरणार्थियों को मुफ्त राशन देने की मांग वाली याचिका पर केंद्र को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (यूएनएचसीआर) के साथ पंजीकृत सभी शरणार्थियों और शरण चाहने वालों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने फैजल अब्दाली द्वारा संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत जनहित याचिका पर परीक्षण करने का निर्णय लेते हुए केंद्र को जवाब दाखिल करने के लिए कहा है।
याचिका में कहा गया है कि कोविड -19 संकट से उत्पन्न आर्थिक मंदी के कारण शरणार्थियों और शरण चाहने वालों के लिए खाद्य असुरक्षा का सामना किया है। भारत के साथ पंजीकृत सभी शरणार्थियों और शरण चाहने वालों को मुफ्त सूखा राशन प्रदान किया जाना चाहिए। इन लोगों से मुफ्त राशन के लिए आधार, राशन कार्ड आदि दस्तावेज की मांग नहीं की जाए।

याचिका में कहा गया है कि यूएनएचसीआर के अनुसार, भारत में 210201 शरणार्थी और शरण चाहने वाले रहते हैं। उनमें से 203235 शरणार्थी श्रीलंका व तिब्बत से हैं और 40859 शरणार्थी और शरण चाहने वाले दूसरे देशों से हैं।
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