जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने कहा, राज्य सरकार डाटा प्रदान करने में विफल रही है कि वन्नियारों को एमबीसी के भीतर एक अलग समूह के रूप में क्यों माना जाना चाहिए। हमारी राय है कि अन्य पिछड़े वर्गों की तुलना में वन्नियार को एक अलग समूह के रूप में मानने का कोई आधार नहीं है। इस प्रकार 2021 अधिनियम अनुच्छेद-14 और 16 के विपरीत हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तमिलनाडु में वन्नियार समुदाय को शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में मिलने वाले 10.5 फीसदी आरक्षण को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने सबसे पिछड़े वर्गों (एमबीसी) के लिए उपलब्ध 20 फीसदी आरक्षण में से वन्नियार समुदाय को 10.5 फीसदी आरक्षण देने वाले तमिलनाडु अधिनियम 2021 को असांविधानिक करार दिया और इस कानून को रद्द करने के मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
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जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने कहा, राज्य सरकार डाटा प्रदान करने में विफल रही है कि वन्नियारों को एमबीसी के भीतर एक अलग समूह के रूप में क्यों माना जाना चाहिए। हमारी राय है कि अन्य पिछड़े वर्गों की तुलना में वन्नियार को एक अलग समूह के रूप में मानने का कोई आधार नहीं है। इस प्रकार 2021 अधिनियम अनुच्छेद-14 और 16 के विपरीत हैं।
कोर्ट ने हालांकि माना कि राज्य सरकार के पास अधिनियम को पारित करने की विधायी क्षमता है। 102वें संविधान संशोधन ने पिछड़े वर्गों की पहचान करने के लिए राज्य की शक्तियों पर रोक लगा दी लेकिन उप-वर्गों की पहचान करने की राज्य की शक्ति को प्रभावित नहीं किया।
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सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु राज्य की ओर से दलील दी गई थी कि 2021 अधिनियम केवल सबसे पिछड़े वर्गों को प्रदान किए गए 20 फीसदी आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकृत है। वहीं प्रतिवादियों का तर्क था कि राज्य ने 102वें सांविधानिक संशोधन अधिनियम का अपमान करते हुए किसी भी मात्रात्मक डाटा पर भरोसा किए बिना समुदायों की पहचान करने का प्रयास किया।