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SC: 'तैयार रहें, हम आपसे मतदाताओं से जुड़े तथ्यों और आंकड़ों पर कुछ सवाल करेंगे', चुनाव आयोग से सुप्रीम कोर्ट

Tue, 12 Aug 2025 01:21 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Supreme Court On SIR: इससे पहले आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि कानून के तहत उसे मसौदा सूची से गायब लोगों के नामों की अलग सूची बनाने की जरूरत नहीं है। न ही सूची साझा करने या किसी कारण से उनके नाम शामिल न होने के कारणों को प्रकाशित करने की जरूरत है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को चुनाव आयोग की ओर से बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया कराने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और जस्टिस जयमाल्या बागची की पीठ ने राजद नेता मनोज झा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की दलीलों से सुनवाई शुरू की। सिब्बल ने तर्क दिया कि एक निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव आयोग ने दावा किया था कि 12 लोग मृत थे, लेकिन वे जीवित पाए गए, जबकि एक अन्य मामले में जीवित लोगों को मृत घोषित कर दिया गया।

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चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि इस तरह के अभियान में कुछ खामियां होना स्वाभाविक है। यह दावा करना कि मृत लोगों को जीवित घोषित किया गया और जीवित लोगों को मृत घोषित किया गया, हमेशा सही किया जा सकता है, क्योंकि यह केवल एक मसौदा सूची है। पीठ ने चुनाव आयोग से कहा कि वह तथ्यों और आंकड़ों के साथ तैयार रहे, क्योंकि कोर्ट प्रक्रिया से पहले मतदाताओं की संख्या, पहले और अब मृतकों की संख्या और अन्य प्रासंगिक विवरणों पर सवाल उठाएगा।
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SIR पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी- भरोसे की कमी, बड़ा मुद्दा नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में एसआईआर को लेकर दाखिल याचिकाओं की सुनवाई में कहा कि इस मामले में बड़ा विवाद नहीं, बल्कि यह ज्यादातर भरोसे की कमी का मामला लगता है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि करीब 1 करोड़ वोटर इस प्रक्रिया से बाहर रह गए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा - 'जब 7.9 करोड़ वोटरों में से 7.24 करोड़ ने जवाब दिया, तो 1 करोड़ वोटर गायब होने की थ्योरी टिकती नहीं है।' चुनाव आयोग ने भी सुप्रीम कोर्ट को बताया कि लगभग 6.5 करोड़ लोगों को बिहार एसआईआर में कोई दस्तावेज जमा नहीं करना पड़ा, क्योंकि वे या उनके माता-पिता 2003 की मतदाता सूची में पहले से शामिल थे। अदालत ने साफ किया कि आंकड़ों से ज्यादा यह मामला भरोसा और धारणा का है, न कि किसी बड़े पैमाने की गड़बड़ी का।

मसौदा सूची 1 अगस्त को प्रकाशित की गई थी
इससे पहले 29 जुलाई को चुनाव आयोग को एक संवैधानिक प्राधिकारी करार देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा था कि अगर बिहार में मतदाता सूची की एसआईआर में बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं, तो वह तुरंत हस्तक्षेप करेगी। मसौदा सूची 1 अगस्त को प्रकाशित की गई थी और अंतिम सूची 30 सितंबर को प्रकाशित होने वाली है। विपक्ष का दावा है कि चल रही प्रक्रिया करोड़ों योग्य नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित कर देगी।
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किसने-किसने लगाई याचिका?
राजद सांसद झा और तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा के अलावा कांग्रेस के केसी वेणुगोपाल, शरद पवार गुट की सुप्रिया सुले, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी. राजा, समाजवादी पार्टी के हरिंदर सिंह मलिक, शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के अरविंद सावंत, झारखंड मुक्ति मोर्चा के सरफराज अहमद और सीपीआई (एमएल) के दीपांकर भट्टाचार्य ने संयुक्त रूप से चुनाव आयोग के 24 जून के फैसले को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया है। पीयूसीएल, एनजीओ एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स जैसे कई अन्य नागरिक समाज संगठन और योगेंद्र यादव जैसे कार्यकर्ताओं ने भी चुनाव आयोग के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया है।

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